दुनिया की प्रमुख करेंसी के मुकाबले डॉलर (Dollar) में काफी मजबूती आई है। रुपया (Rupee) के मुकाबले भी डॉलर मजबूत हुआ है। अगर डॉलर में मजबूती का ट्रेंड जारी रहता है तो इससे ग्लोबल इकोनॉमी (Global Economy) में रिकवरी के ट्रेंड को चोट पहुंच सकती है। दुनिया में ज्यादातर फॉरेन ट्रेड का पेमेंट डॉलर में होता है।
इस साल जनवरी से अब तक डॉलर 7 फीसदी मजबूत हो चुका है। इसकी वजह फेडरल रिजर्व के रुख में आया बदलाव है। वह इंटरेस्ट रेट बढ़ा रहा है। उसने कहा है कि वह इस साल कई बार इंटरेस्ट रेट बढ़ाएगा। इससे इनवेस्टर्स ने डॉलर की खरीदारी बढ़ा दी है। इससे डॉलर मजबूत हो रहा है।
डॉलर में मजबूती से अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व को बढ़ती महंगाई को काबू में करने में मदद मिलेगी। लेकिन, इससे दूसरे देशों के लिए आयात करना महंगा हो जाएगा। इससे इन देशों में महंगाई की आग और भड़ेकगी। खासकर इससे उभरते देशों को ज्यादा मुश्किल होने वाली है।
उभरते बाजारों में पहले से महंगाई तेजी से बढ़ रही है। इसे काबू में करने के लिए केंद्रीय बैंक इंटरेस्ट रेट्स बढ़ा रहे हैं। इंडिया और मलेशिया के केंद्रीय बैंकों ने इस महीने इंटरेस्ट रेट्स बढ़ाया है। इंडिया में अगले महीने के पहले हफ्ते में RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की बैठक होने वाली है। अनुमान है कि एक बार फिर रेपो रेट बढ़ सकता है।
विकसित देशों पर भी डॉलर की मजबूत का असर पड़ा है। यूरो गिरकर पांच साल के लो पर आ गया है। स्विस फ्रैंक में भी कमजोरी आई है। इधर, हांगकांग के केंद्रीय बैंक को अपनी करेंसी को गिरने से बचाने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा है। जापान की करेंसी येन भी दो दशक के लो पर पहुंच गया है।
स्कोटियाबैंक में एशिया-पैसेफिक के हेड तुली मैक्कुली ने कहा, "फेडरल रिजर्व के इंटरेस्ट रेट बढ़ाने से दुनिया की दूसरी इकोनॉमी के लिए भी सिरदर्द बढ़ रहा है। इससे उन देशों से कैपिटल का पलायन हो रहा है और करेंसी में कमजोरी आ रही है।"
एक्सपर्ट्स का कहना है कि कोरोना की मार से ग्लोबल इकोनॉमी धीरे-धीरे पटरी पर आ रही थी। लेकिन, इसमें बड़ी बाधा दिख रही है। पहले, यूक्रेन क्राइसिस के चलते सप्लाई में दिक्कत आई। इससे दुनियाभर में महंगाई बढ़ने लगी। अब डॉलर की मजबूत एक बड़ी समस्या दिख रही है।