फाइनेंस मिनिस्टर्स और केंद्रीय बैंकों के गवर्नर्स की G20 की बैठक में यूक्रेन-रूस लड़ाई (Russia-Ukraine War) पर सबसे ज्यादा चर्चा होने की उम्मीद है। यह बैठक 24-25 फरवरी को बेंगलुरु में होने जा रही है। इस लड़ाई की वजह से खासकर यूक्रेन के लाखों लोगों की जिंदगी नर्क बन चुकी है। साथ ही वित्तीय अस्थिरता का खतरा भी पैदा हुआ है। सीएनबीसी-टीवी18 को जानकारी मिली है कि मिनिस्ट्रियल डेक्लेरेशन (Ministerial Declaration) में परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी की कड़ी आलोचना शामिल होगी। उच्च-स्तरीय बैठक से पहले एक अधिकारी ने कहा कि कूटनीति और बातचीत के जरिए टकराव का शांतिपूर्ण समाधान जरूरी है। आज का युग युद्ध का नहीं है।
रूस-यूक्रेन युद्ध का एक साल पूरा हो चुका है
रूस और यूक्रेन की लड़ाई का एक साल पूरा हो गया है। पिछले साल 22 फरवरी को रूस ने यूक्रेन पर हमला शुरू किया था। हालांकि, G20 सुरक्षा के मसलों की चर्चा का मंच नहीं है, लेकिन माना जा रहा है कि बैठक में हिस्सा ले रहे 72 प्रतिनिधि इस बात पर व्यापक चर्चा करेंगे कि इस लड़ाई ने किस तरह ग्लोबल इकोनॉमी को नुकसान पहुंचाया है। इस लड़ाई की वजह से किस तरह इनफ्लेशन बढ़ा है, एनर्जी और फूड क्राइसिस की स्थिति पैदा हुई है। ग्लोबल इकोनॉमी की ग्रोथ रुक गई है।
मिलकर पॉलिसी बनाने पर बन सकती है सहमति
सूत्रों ने CNBC-TV18 को बताया कि जी20 देशों के वित्तमंत्री वित्तीय स्थिरता और मैक्रोइकोनॉमिक ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए नापतौल कर मॉनेटरी, फिस्कल और स्ट्रक्चरल पॉलिसी अपनाने की जरूरत पर जोर दे सकते हैं। एक सूत्र ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया, "इस मीटिंग में इकोनॉमिक पॉलिसी के मामले में लचीला रुख अपनाने पर जोर दिया जा सकता है। वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को सहायता उपलब्ध कराने की जरूरत महसूस की जा सकती है। साथ ही ग्रोथ में सुस्ती से निपटने के उपायों पर भी चर्चा हो सकती है।"
कमजोर देशों के कर्ज के जाल में फंसने से बचाने के उपाय जरूरी
जी20 देशों के वित्तमंत्री कम और मध्यम इनकम वाले देशों के कर्ज के जाल में फंसने से बचने के उपायों पर भी बातचीत कर सकते हैं। प्रतिनिधि कर्ज के संकट का सामना कर रहे देशों की मदद के लिए सरकारी और प्राइवेट वित्तीय संस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल पर भी जोर दे सकते हैं। सूत्रों ने बताया कि डेक्लेरेशन में इस बात का जिक्र हो सकता है कि ग्लोबल इकोनॉमी की ग्रोथ में सुस्ती की वजह से उभरते और विकासशील देशों के कर्ज का संकट और बढ़ सकता है। भारतीय अधिकारी श्रीलंका और अफ्रीकी देशों में कर्ज संकट के जल्द समाधान पर जोर दे सकते हैं।