बैंक सेविंग अकाउंट (Bank Saving Account) पैसा रखने का सबसे सुरक्षित (Safe) माध्यम है। इसे ऑपरेट करना भी काफी आसान है। आपके पास जब पैसा आए अकाउंट में डिपॉजिट कर दीजिए, जब जरूरत हो ATM से निकाल लीजिए। इस अकाउंट में जमा आपके पैसे पर बैंक इंटरेस्ट (Interest) देता है।
ज्यादातर बैंकों में सेविंग अकाउंट में मिनिमम बैलेंस (Minimum Balance) मेंटेन करना जरूरी है। प्राइवेट बैंकों में मिनिमम बैलेंस औसतन 10,000 रुपये है। सरकारी बैंकों में यह कम है। एसबीआई में जीरो बैलेंस अकाउंट की सुविधा मिलती है।
सेविंग अकाउंट पर बैंकों का इटरेस्ट रेट अलग-अलग है। प्राइवेट सेक्टर के दो सबसे बड़े बैंक HDFC Bank और ICICI Bank 50 लाख रुपये से कम डिपॉजिट पर 3 फीसदी इंटरेस्ट ऑफर करते हैं। अगर सेविंग अकाउंट में 50 लाख रुपये से ज्यादा का डिपॉजिट है तो वे 3.5 फीसदी इंटरेस्ट ऑफर करते हैं।
आइए आपको बताते हैं इंटरेस्ट का कैलकुलेशन कैसे होता है:
RBI का नियम कहता है कि इंटरेस्ट रेट का कैलकुलेशन (Calculation of Interest rate) आपके अकाउंट में डिपॉजिट अमाउंट के क्लोजिंग बेसिस पर रोजाना होना चाहिए। फिर, इंटरेस्ट का पैसा आपके सेविंग अकाउंट में हर छह महीने या हर तीन महीने पर डाल दिया जाता है। केंद्रीय बैंक ने बैंकों को तिमाही आधार पर इंटेरस्ट का पैसा अकाउंट में ट्रांसफर करने को कहा है। इससे लोग सेविंग के लिए प्रोत्साहित होंगे।
अगर सेविंग अकाउंट में डेली अमाउंट (डिपॉजिट) 3 लाख रुपये है और इंटरेस्ट रेट 4 फीसदी है तो कैलकुलेशन इस तरह होगा:
मंथली बेसिस पर इंटरेस्ट=डेली बैलेंस * (दिन की संख्या) * इंटरेस्ट/(साल में कुल दिन)
3 लाख*30*(4/100)/365=986 रुपये हर महीना इंटरेस्ट
यहां डेली बैलेंस 3 लाख रुपये है। दिन की संख्या 30 है। इंटरेस्ट रेट 4 फीसदी है। साल में कुल दिन 365 है।
सेविंग अकाउंट्स के इंटरेस्ट पर टैक्स का कैलकुलेशन कैसे होता है?
सेविंग अकाउंट से मिले इंटरेस्ट को इनकम टैक्स नियमों में 'इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज' माना जाता है। आपको अपने इनकम टैक्स रिटर्र में इस इनकम के बारे में बताना जरूरी है। इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 194ए में कहा गया है कि सेविंग अकाउंट के इटरेस्ट पर TDS लागू नहीं होता है।
टैक्स एक्सपर्ट्स का कहना है कि सेविंग्स अकाउंट से एक फाइनेंशियल ईयर में 10,000 रुपये की इंटरेस्ट इनकम को टैक्स से छूट हासिल है। इससे ज्यादा के इंटरेस्ट पर टैक्स लगता है। टैक्स की दर टैक्सपेयर के स्लैब के हिसाब से होगी।