Bank Privatisation पर पिछले महीने RBI की एक रिपोर्ट आई थी। इसमें कहा गया था कि सरकारी बैंकों के प्राइवेटाइजेशन से फायदा कम नुकसान ज्यादा होगा। इसमें यह भी कहा गया था कि फाइनेंशियल क्लूजन (Financial Inclusion) जैसे सोशल ऑब्जेक्टिव्स के मामले में सरकारी बैंकों का रिकॉर्ड प्राइवेट बैंकों से अच्छा है। इस रिपोर्ट के बाद बैंकों के निजीकरण को लेकर नई बहस शुरू हो गई। अब RBI के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव (D Subbarao) ने इस बारे में अपनी राय रखी है।
सुब्बाराव ने कहा कि प्राइवेट बैंकों का फोकस मुनाफे कमाने पर होता है, जबकि सरकारी बैंकों का फोकस सामाजिक योजनाओं पर होता है। इस वजह से मुनाफा कमाने के मामले में वे पिछड़ जाते हैं। सरकारी बैंकों के निजीकरण से बैंकिंग सिस्टम की क्षमता तो बढ़ेगी, लेकिन फाइनेंशियल इनक्लूजन और छोटे उद्यमों को लोन देने जैसे सोशल ऑब्जेक्टिव पर असर पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि सरकारी बैंकों ने सोशल ऑब्जेक्टिव्स पूरे करने में बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन, अब आगे बढ़ने का समय आ गया है। हमें सोशल ऑब्जेक्टिव्स के लिए बैंकों के डिपॉजिटर्स और बॉरोअर्स पर बोझ डालने के बजाय दूसरे इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल करना चाहिए। प्राइवेटाइजेशन को लेकर आक्रमक रुख अपनाने की जरूरत नहीं है। लेकिन, इस मसले को लंबे समय तक टाला नहीं जा सकता। हमें इसके लिए एक रोडमैप बनाना चाहिए। हम सरकारी बैंकों ने निजीकरण के लिए 10 साल का समय तय कर सकते हैं।
क्या प्राइवेटाइजेशन से बैंकों के एसेट-लायबिलिटी के बीच बड़ा अंतर हो सकता है? इस सवाल के जवाब में सुब्बाराव ने कहा कि मैंने देखा है कि डॉ. प्रणब सेन ने अपनी स्पीच में इस मसले को उठाया है। मैंने देखा है कि डिपॉजिट की एवरेज मैच्योरिटी (लायबिलिटी) करीब ढ़ाई साल है, जबकि लोन का एवरेज पीरियड करीब 9 साल है। इस एसेट-लायबिलिटी की दो वजहे हैं। पहला, इंडियन बैंक्स फंड की अपनी जरूरतों के लिए कम अवधि वाले रिटेल डिपॉजिट पर पूरी तरह से निर्भर हैं। पश्चिमी देशों के बैंकों के साथ ऐसा नहीं है। हमारे यहां बैंकों को डिपॉजिट्स के लिए कैपिटल मार्केट का रुख करने की इजाजत नहीं है।
उन्होंने कहा कि दूसरी वजह यह है कि पहले बैंकों के पास छोटी अवधि के लोने देने के लिए विशेषज्ञता होती थी। लेकिन, रिफॉर्म्स के बाद यूनिवर्सल बैंक वजूद में आए हैं, जिससे बैंकों के लोन पोर्टफोलियो में लंबी अवधि के लोन की हिस्सेदारी बढ़ी है। इससे लोन की एवरेज मैच्योरिटी भी बढ़ गई है।
यह पूछने पर कि क्या दो साल में इनफ्लेशन 4 फीसदी पर आ जाएगा, उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि यह मुमकिन है। आरबीआई के मॉनेटरी पॉलिसी एक्शन और संभावित बेस इफेक्ट की वजह से इसकी उम्मीद दिखती है। मॉनेटरी पॉलिसी एक्शन में इंटरेस्ट रेट में वृद्धि और लिक्विडिटी वापस लेने के उपाय शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि आरबीआई पहले ही इंटरेस्ट रेट 1.40 फीसदी बढ़ा चुका है। इसे और बढ़ाने की जरूरत है, लेकिन मैं यह अनुमान नहीं लगा सकता है कि इसमें और कितनी वृद्धि जरूरी है। इनफ्लेशन के 6 फीसदी के ट्रेंड को देखते हुए लगता है कि इंटरेस्ट रेट 7 फीसदी होना चाहिए। हालांकि, ग्लोबल स्लोडाउन को देखते हुए हो सकता है कि आरबीआई ज्यादा आक्रामक रुख न अपनाए।