Mukul Asher

Mukul Asher
EPFO का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) साल 2021 में 15.7 लाख करोड़ रुपये था। यह 2019-20 में इंडिया की 203.3 लाख करोड़ रुयये की GDP का 7.7 फीसदी था। ईपीएफओ के 6.9 करोड़ सब्सक्राइबर्स हैं। यह 7.1 करोड़ लोगों को पेंशन देता है।
इंडिया की इकोनॉमी डिजिटल हो रही है, जिसमें फिनटेक का बड़ा हाथ है। ऐसे में ईपीएफओ को अपने कामकाज के तरीकों, इनवेस्टमेंट और प्रोसेसेज को आधुनिक बनाने की जरूरत है। इससे यह ज्यादा उम्र के अपने सब्सक्राइबर्स की अच्छी तरह से मदद कर पाएगा। साथ ही एंप्लॉयीज के बीच इसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी।
United Nations के अनुमान के मुताबिक, इंडिया में 65 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या 2050 तक 25.6 करोड़ तक पहुंच जाएगी। साल 2000 में यह 4.8 करोड़ थी। लंबे समय से ईपीएफओ के ट्रस्टी बोर्ड के इंटरेस्ट रेट के बारे में फैसला लेने और सब्सक्राइबर्स के अकाउंट में पैसा आने में काफी देर हो जाती है। ऐसा पिछले कई सालों से हो रहा है।
अगर हम इंटरेस्ट रेट साइकिल के बारे में बात करें तो फाइनेंशियल ईयर 2020-21 के लिए ईपीएफओ के ट्रस्टी बोर्ड ने 8.5 फीसदी इंटरेस्ट रेट के बारे में फैसला लिया। यह फैसला मार्च 2021 में लिया गया। इसे अक्टूबर 2021 में एक सर्कुलर के जरिए नोटिफाय कर दिया गया। लेकिन, इंटरेस्ट सब्सक्राइबर्स के अकाउंट में दिसंबर 2021 में आया। मार्च और दिसंबर के बीच गैप करीब 9 महीने का था। यह बहुत ज्यादा है।
इस साल की शुरुआत में यह माना जा रहा था कि फाइनेंशियल ईयर 2021-22 का इंटरेस्ट रेट जुलाई 2022 तक सब्सक्राइबर्स के अकाउंट में आ जाएगा। यह चार महीने का गैप होता।
सब्सक्राइबर्स के अकाउंट में इंटरेस्ट क्रेडिट नहीं होने की मुख्य वजह यह है कि ईपीएफओ ने इंटरेस्ट पेमेंट के लिए ग्लोबल स्टैंडर्ड को नहीं अपनाता है। वह मार्केट से जुड़ी इनकम पर इंटरेस्ट पेमेंट नहीं करता है। इसके बजाय वह एडमिनिस्टर्ड रेट ऑफ इंटरेस्ट का पालन करता है। इसके तहत मार्च में इंटरेस्ट रेट का ऐलान होता है यानी फाइनेंशियल ईयर खत्म होने के ठीक पहले।
इंटरेस्ट के लिए एडमिनिस्टर्ड रेट पर निर्भरता का मतलब है कि स्थापना के 70 साल बाद भी ईपीएफओ की अपनी इनवेस्टमेंट टीम नहीं है। अगर यह टीम होती तो बाहरी फंड मैनेजर्स को सौंपी गई जिम्मेदारी की मॉनिटरिंग कर पाती।
दूसरी बड़ी वजह यह है कि ईपीएफओ श्रम और रोजगार मंत्रालय के तहत आता है। इसे इंटरेस्ट रेट के पेमेंट के लिए वित्त मंत्रालय की मंजूरी लेने पड़ती है। इसकी वजह यह है कि इंटरेस्ट पेमेंट पर हर साल बहुत ज्यादा रकम खर्च होती है। वित्तीय मामलों पर फाइनेंस मिनिस्ट्री और ईपीएफओ के एप्रोच अलग-अलग हैं। वित्त मंत्रालय को ईपीएफओ की वित्तीय स्थिति को देखनी पड़ती है। उसे जिन इंफॉर्मेंशन की जरूरत होती है, वह ईपीएफओ का मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम नहीं दे पाता है।
इंटरेस्ट पेमेंट में देरी से मेंबर्स को कैस होता है लॉस?
इंटरेस्ट रेट क्रेडिट होने में सब्सक्राइबर्स को होने वाले नुकसान को एक उदाहरण की मदद से आसानी से समझा जा सकता है।
मान लीजिए एक एंप्लॉयी के ईपीएफ अकाउंट में 31 मार्च, 2021 को बतौर इंटरेस्ट 1,000 रुपये आने हैं। लेकिन, यह पैसा 31 जुलाई को अकाउंट में आता है। यहां टाइम वैल्यू और अपॉर्चुनिटी कॉस्ट का असर पड़ता है। जुलाई में क्रेडिट होने वाले 1000 रुपये की रियल वैल्यू मार्च में क्रेडिट होने वाले 1000 रुपये की रियल वैल्यू से कम हो जाती है। इसकी वजह समय के साथ वैल्यू में आई गिरावट है।
दूसरा, इस देर के चलते सब्सक्राइबर्स चार महीने तक इस 1000 रुपये का इस्तेमाल नहीं कर सकता है। यह माना जाता है कि 31 मार्च, 2022 के बाद किसी तारीख को अकाउंट में आने वाला 1000 रुपये की वैल्यू नॉमनल होती है न कि रियल। सब्सक्राइबर्स पर इसका बड़ा असर पड़ता है।
दुनियाभर में प्रोविडेंट फंड्स फाइनेंशियल ईयर के आखिर में इंटरेस्ट का पैसा सब्सक्राइबर्स के अकाउंट में क्रेडिट कर देते हैं। उदाहरण के लिए मलेशिया में फाइनेंशियल ईयर जनवरी-दिसंबर के दौरान होता है। वहां हर साल 1 जनवरी को इंटरेस्ट का पैसा सब्सक्राइबर्स के अकाउंट में आ जाता है।
क्या किया जा सकता है?
पेमेंट में देरी से बचने के लिए इंटरेस्ट का 60-65 फीसदी पैसा सुरक्षा के उपायों के साथ एक महीने के अंदर क्रेडिट किया जा सकता है। बाकी पैसा वित्त मंत्रालय के एप्रूवल के बाद क्रेडिट किया जा सकता है।
पिछले कुछ सालों में ईपीएफओ ने अपने मेंबर्स को सेवाएं में सुधार लाने के लिए कई कदम उठाए हैं। लेकिन, इसे प्रोफेशनल मॉडर्न सोसायटी के रूप में बदलने के लिए राजनीतिक फैसले की जरूरत है। इसे ऑटोनोमस ऑर्गेनाइजेशन बनाने की जरूरत है। इसमें स्किल्ड प्रोफेशनल और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यह सब पारदर्शी नियम और कानून के तहत होने चाहिए।
(The writer is a Professorial Fellow (retired), Lee Kuan Yew School of Public Policy, National University of Singapore)
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