EPFO ने प्राइवेट एंप्लॉयीज को ज्यादा पेंशन हासिल करने का मौका दिया है, क्या आपको इसका फायदा उठाना चाहिए?
EPFO ने ज्यादा पेंशन पाने का एक और मौका एंप्लॉयीज को दिया है। इसके लिए उसने 20 फरवरी को सर्कुलर जारी किया है। इसके बाद से इस बात की खूब चर्चा हो रही है कि ज्यादा पेंशन की स्कीम को सेलेक्ट करने से एंप्लॉयी को कितना फायदा होगा। यह मामला कुछ जटिल है। इसे ठीक से समझने के बाद ही आप इस स्कीम के बारे में सही फैसला ले सकेंगे
1 सितंबर, 2014 को EPS के सदस्य रहे एंप्लॉयीज को EPFO ज्यादा पेंशन वाली स्कीम का फायदा उठाने के लिए एक मौका दे रहा है। इसके लिए आपको 3 मार्च तक अप्लाई करना होगा।
अगर 1 सितंबर, 2014 को आप एंप्लाई थे तो आपको कंपनी की तरफ से एक मेल आया होगा। इसमें कहा गया होगा कि अगर चाहें तो EPS के तहत आप ज्यादा पेंशन वाली स्कीम के लिए अप्लाई कर सकते हैं। दरअसल, 1 सितंबर, 2014 को EPS के सदस्य रहे एंप्लॉयीज को EPFO ज्यादा पेंशन वाली स्कीम का फायदा उठाने के लिए एक मौका दे रहा है। इसके लिए आपको 3 मार्च तक अप्लाई करना होगा। ऐसा सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ध्यान में रखकर EPFO कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पिछले साल नवंबर में एक फैसला दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2022 में कहा था कि जो एंप्लॉयी 1 सितंबर, 2024 को EPFO के सदस्य थे, वे ज्यादा पेंशन का लाभा उठा सकते हैं। इसके लिए उनकी वास्तविक बेसिक सैलरी से EPS में कंट्रिब्यूशन जरूरी होगा। अभी EPS में कंट्रिब्यूशन के लिए प्रति माह 15,000 रुपये सैलरी की सीमा तय है। इसका मतलब यह है कि अगर आपकी वास्तविक बेसिक सैलरी 50,000 रुपये है तो भी EPS में होने वाला कंट्रिब्यूशन 15,000 रुपये के आधार पर ही होता है। इससे वजह से EPS में काफी कम पैसा जमा होता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ध्यान में रख EPFO ने 20 फरवरी को एक सर्कुलर जारी किया है।
EPS क्या है?
EPFO प्राइवेट नौकरी करने वाले एंप्लॉयीज के रिटायरमेंट अमाउंट का प्रंबधन करता है। इसकी दो स्कीमें हैं-एंप्लॉयी प्रोविडेंट फंड (EPF) और एंप्लॉयी पेंशन स्कीम (EPS)। आपकी बेसिक सैलरी का 12 फीसदी हर महीने EPF अकाउंट में डिपॉजिट होता है। आपका एंप्लायर (कंपनी) भी 12 फीसदी (बेसिक सैलरी का) कंट्रिब्यूशन करता है। लेकिन, एंप्लॉयर का पूरा कंट्रिब्यूशन EPF में नहीं जाता है। सरकार की तरफ से तय सैलरी की सीमा के आधार पर 8.33 फीसदी हिस्सा EPS में चला जाता है। एंप्लॉयर के कंट्रिब्यूशन का बाकी हिस्सा EPF में जाता है। 58 साल की उम्र पूरी होने पर जब आप रिटायर करते हैं तो आपके EPF अकाउंट में जमा पूरा पैसा आपको एकमुश्त दे दिया जाता है।
EPS अकाउंट में भी पैसा तब तक बढ़ता रहता है जब तक आप रिटायर नहीं कर जाते। रिटायर होने के बाद आपको इस पैसे से हर महीना पेंशन मिलती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद EPS अकाउंट में अब ज्यादा पैसे जमा होंगे। इससे आपको मिलने वाली पेंशन भी बढ़ जाएगी। आप जब तक जीवित रहते हैं आपको पेंशन मिलती रहती है। आपके निधन के बाद आपकी पत्नी को 50 फीसदी पेंशन मिलती है।
सुप्रीम कोर्ट ने EPFO कानून में बदलाव का क्यों दिया फैसला?
EPS रेगुलेशन 1995 में एंप्लॉयीज को सरकार की तरफ से तय सीमा (15000 रुपये) के मुकाबले ज्यादा सैलरी के आधार पर EPS कॉर्पस में कंट्रिब्यूट करने की इजाजत थी। कंसल्टेंसी फर्म Delitte India के पार्टनर सरस्वती कस्तूरीरंगन ने ने बताया कि 2014 से पहले EPS में ज्यादा सैलरी के आधार पर कंट्रिब्यूट करने का प्रावधान था। लेकिन, ज्यादातर एंप्लॉयीज ने इसे सेलेक्ट नहीं किया या उन्हें इसके बारे में जानकारी नहीं थी। व्याहारिक रूप से यह कहा जा सकता है कि जिन एंप्लॉयीज ने ज्यादा सैलरी के आधार पर कंट्रिब्यूशन को सेलेक्ट किया था, उनके आवेदन EPFO की तरफ से रिजेक्ट कर दिए गए। आखिरकार इसे कोर्ट में चुनौती दी गई। फिर, यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा।
इस बीच, EPFO ने एक दूसरा सर्कुलर जारी किया। इसमें EPS में कुछ बड़े बदलाव किए गए। जो एंप्लॉयीज भी अपनी ज्यादा सैलरी के आधार पर EPS में कंट्रिब्यूट कर रहे थे, उन्हें लिखित में यह बताना जरूरी था कि वे ज्यादा कंट्रिब्यूशन को जारी रखना चाहते हैं। ऐसा करने में नाकाम रहने पर ईपीएस में ज्यादा जितना भी कंट्रिब्यूशन किया गया था उसे निकालकर EPF अकाउंट में डिपॉजिट करने का प्रस्ताव था।
दूसरा, EPFO ने वह फॉर्मूला बदल दिया जिसके आधार पर पेंशन अमाउंट का कैलकुलेशन होता है, जिसका हकदार एंप्लॉयी रिटायरमेंट के बाद होता है। आप EPS से पेंशन का जितना अमाउंट पाते हैं, वह आपकी पेंशनेबल सैलरी पर निर्भर करता है। यह फॉर्मूला है : पेंशनेबल सैलरी (अंतिम 12 महीने की औसत सैलरी) X कंट्रिब्यूशन के पूरे साल / 70 ।
EPFO ने 2014 में पेंशनेबल सैलरी की परिभाषा बदल दी। 2014 से अंतिम 60 महीने की औसत सैलरी को पेंशनेबल सैलरी माना जाता है। कस्तूरीरंगन ने कहा, "इसका यह भी मतलब है कि पेंशन घटने से सरकार का बोझ कम हो गया। अगर लंबी अवधि का औसत निकाला जाएगा तो संख्या कम आएगी। अंतिम 12 महीने की सैलरी का एवरेज निकालने पर संख्या ज्यादा आएगी।"
तीसरा, जिन एंप्लॉयीज ने EPS में ज्यादा कंट्रिब्यूशन सेलेक्ट किया था, उनके मामले में सरकार ने कहा था कि हर महीने सैलरी में अंतर (15,000 रुपये से ऊपर की सैलरी) का अतिरिक्त 1.6 फीसदी EPS अकाउंट में डिपॉजिट करना होगा। इसका मकसद भी सरकार का बोझ कम करना था, क्योंकि EPS एक डिफाइंड बेनेफिट प्लान है। आसान शब्दों में कहा जाए तो रिटायरमेंट के बाद EPS जो पेंशन आपको देती है वह एक फिक्स्ड अमाउंट (जो फॉर्मूला ऊपर बताया गया है) होता है और इस पर बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर नहीं पड़ता है। यह अतिरिक्त 1.6 फीसदी एंप्लॉई के पीएफ कंट्रिब्यूशन से लिया जाता है।
चौथा और संभवत: सबसे अहम यह कि EPFO ने कहा था कि एंप्लॉयीज जिनकी बेसिक सैलरी 15,000 रुपये प्रति माह से ज्यादा है, उन्हें EPFO का मेंबर नहीं माना जाएगा। आखिर में यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या असर पड़ेगा?
अगर आप पहले से मैक्सिमम 15,000 रुपये की मंथली बेसिक सैलरी पर EPFO में कंट्रिब्यूट करते आ रहे हैं तो आपको कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। लेकिन, अगर आप 1 सितंबर, 2014 से पहले EPFO में कंट्रिब्यूशन करते आ रहे हैं और आपका कंट्रिब्यूशन आपकी वास्तिक सैलरी (15,000 रुपये से ऊपर की बेसिक सैलरी) के आधार पर होता है तो आपको दो ऑप्शन में से किसी एक का चुनाव करना होगा। या तो आप EPS में सीमित कंट्रिब्यूशन जारी रखें या ज्यादा EPS का चुनाव करें।
यह याद रखें कि भले ही EPF में आपका कंट्रिब्यूशन आपकी वास्तविक सैलरी के आधार पर होता है, EPS में आपका 8.33 फीसदी कंट्रिब्यूशन अब भी सैलरी की सरकार की तय सीमा (15000 रुपये) पर ही होता है। मान लीजिए आपकी मंथली बेसिक सैलरी 50,000 रुपये है। आपका एंप्लॉयर आपको EPF में पूरा कंट्रिब्यूशन करने की इजाजत देता है। इसका मतलब है कि हर महीने आपकी बेसिक सैलरी का 12 फीसदी यानी 6000 रुपये आपके EPF अकाउंट में जमा होगा। आपका एंप्लॉयर भी 12 फीसदी के बराबर अमाउंट (6000 रुपये) कंट्रिब्यूट करेगा। आपके एंप्लॉयर के कंट्रिब्यूशन में से 1,250 रुपये EPS (15,000 रुपये का 8.33 फीसदी) EPS अकाउंट में जमा हो जाता है। बाकी, 4,750 रुपये (6000-1,250 रुपये) EPF में जाता है।
अब यह बदल जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एप्लॉयर को अपनी वास्तिवक सैलरी के आधार पर EPS में ज्यादा कंट्रिब्यूशन करने का मौका मिलेगा। अगर आप कहते हैं कि आप इसका फायदा उठाना चाहते हैं तो EPFO आपकी ज्वाइनिंग डेट या 1 नवंबर, 1995 में से जो बाद में होगा, उसे मानेगा। फिर, वह वह आपके EPF अकाउंट से पैसे EPS में ट्रांसफर करेगा। इसके अलावा वह हर महीने अतिरिक्त 1.16 फीसदी अमाउंट डिडक्ट करेगा।
क्या आपको ज्यादा पेंशन के इस मौके का इस्तेमाल करना चाहिए?
EPS अकाउंट में कंट्रिब्यूशन बढ़ने से रिटायरमेंट के बाद मिलने वाला EPF का आपका एकमुश्त फंड कम हो जाएगा। कस्तूरीरंगन ने कहा कि इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। उन्होंने कहा, "आप अपनी मंथली सैलरी देखिए। अगर आपकी उम्र 30 प्लस या 40 प्लस हैं तो आपको अनुमान लगाना होगा कि 50 साल की उम्र के बाद आपकी सैलरी कितनी होगी और कितना इंक्रीमेंट आपको मिलने की उम्मीद है।"
उन्होंने कहा कि EPS से आपको रिटायरमेंट बाद रेगुलर इनकम मिलेगी। डिफाइंड बेनेफिट स्कीम रिटायर्ड लोगों के लिए फायदेमंद होती है, क्योंकि इसमें पेंशन अमाउंट मार्केट से लिंक्ड नहीं होता है। इसके अलावा आपको टैक्स के पड़ने वाले असर को भी देखना होगा। EPF अकाउंट में आपका पैसा टैक्स-फ्री होता है। शर्त यह है कि इसमें आपका कंट्रिब्यूशन 5 साल से ज्यादा होना चाहिए। लेकिन, हर महीने मिलने वाली पेंशन टैक्सेबल होती है।