FD Interest Rates: बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट में पैसा रखने वाले लोगों के लिए अच्छी खबर है। इंडियन बैंक ने अपने दो स्पेशल फिक्स्ड डिपॉजिट स्कीम के इंटरेस्ट रेट्स बढ़ा दिए हैं। इंडियन बैंक एक सरकारी बैंक है। उसने आरबीआई के रेपो रेट बढ़ाने के बाद इंटरेस्ट रेट बढ़ाने का ऐलान किया है। इस महीने की शुरुआत में आरबीआई ने रेपो रेट 5.25 फीसदी से बढ़ाकर 5.50 फीसदी कर दिया था।
दो स्कीमों के इंटरेस्ट रेट में 15 बेसिस प्वाइंट्स का इजाफा
Indian Bank ने अपनी एफडी स्कीमों Ind Grow का इंटरेस्ट रेट 15 बेसिस प्वाइंट्स बढ़ाया है। यह स्कीम 555 दिन की है। उसने Ind Prosper डिपॉजिट का इंटरेस्ट रेट भी 15 बेसिस प्वाइंट्स बढ़ाया है। यह स्कीम 777 दिन की है। इससे दोनों एफडी स्कीम में कस्टमर्स को अपने इनवेस्टमेंट पर पहले से ज्यादा इंटरेस्ट मिलेगा।
दोनों स्कीमों के इंटरेस्ट रेट्स में वृद्धि 23 अक्टूबर से लागू
इंटरेस्ट रेट में वृद्धि 23 अक्तूबर, 2026 से लागू हो गई है। 555 दिन की Ind Grow स्कीम का इंटरेस्ट रेट अब 6.65 फीसदी से बढ़कर सालाना 6.80 फीसदी हो गया है। 777 दिन की Ind Prosper स्कीम का इंटरेस्ट रेट अब 6.60 फीसदी से बढ़कर 6.75 फीसदी हो गया है। इनवेस्टर्स इन दोनों स्कीमों के नए इंटरेस्ट रेट्स का फायदा उठा सकते हैं।
सीनियर सिटीजंस को अतिरिक्त 0.50 फीसदी इंटरेस्ट मिलेगा
सीनियर सिटीजंस को इंडियन बैंक की इन दोनों स्कीमों में ज्यादा इंटरेस्ट मिलेगा। इंडियन बैंक आम तौर पर सामान्य कस्टमर्स के मुकाबले सीनियर सिटीजंस को 0.50 फीसदी इंटरेस्ट रेट ऑफर करता है। यह सुपर सीनियर सिटीजंस को 0.75 फीसदी इंटरेस्ट रेट ऑफर करता है। इन दोनों स्कीमों में भी सीनियर सिटीजंस को ज्यादा इंटरेस्ट रेट का फायदा मिलेगा।
इनवेस्टर्स दोनों स्कीम में ज्यादा इंटरेस्ट रेट का फायदा उठा सकते हैं
यह ध्यान में रखने की जरूरत है कि Ind Grow और Ind Prosper स्पेशल-टेन्यर डिपॉजिट स्कीम हैं। कस्टमर्स दोनों स्कीमों में निश्चित अवधि के लिए एफडी कर ज्यादा इंटरेस्ट रेट का फायदा उठा सकते हैं। इनवेस्टर्स को यह ध्यान में रखने की जरूरत है कि फिक्स्ड डिपॉजिट स्कीम से मिलने वाले इंटरेस्ट पर टैक्स लगता है।
एफडी में निवेश से पहले इंटरेस्ट पर टैक्स के नियमों को जान लें
FD Interest पर इनवेस्टर के टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है। दरअसल, इंटरेस्ट से हुई इनकम को दूसरे स्रोत से हुई इनकम माना जाता है। इसे इनवेस्टर की इनकम में जोड़ दिया जाता है। फिर, वह जिस टैक्स स्लैब में आता है, उसके हिसाब से इस पर टैक्स लगता है। ज्यादा टैक्स स्लैब में आने वाले लोगों को इंटरेस्ट पर ज्यादा टैक्स चुकाना पड़ता है। कम टैक्स स्लैब में आने वाले इनवेस्टर्स को कम टैक्स चुकाना पड़ता है।