Gold Price Outlook: 3 लाख रुपये के पार जा सकता है सोना, अमेरिकी अर्थशास्त्री का बड़ा अनुमान; जानिए वजह

Gold Price Outlook: अमेरिकी अर्थशास्त्री एड यार्डेनी का अनुमान है कि 2029 तक सोना अंतरराष्ट्रीय बाजार में 10,000 डॉलर प्रति औंस पहुंच सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो भारतीय बाजार में गोल्ड का भाव 3 लाख रुपये के पार जा सकता है। जानिए किस वजह से आ सकती है गोल्ड में फिर जोरदार तेजी।

अपडेटेड Dec 22, 2025 पर 3:05 PM
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अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का दाम फिलहाल 4,410 डॉलर प्रति औंस है।

Gold Price Outlook: अमेरिकी अर्थशास्त्री और दिग्गज मार्केट स्ट्रैटेजिस्ट एड यार्डेनी (Ed Yardeni) का मानना है कि इस दशक के अंत तक सोने में जबरदस्त तेजी देखने को मिल सकती है। CNBC-TV18 के मुताबिक, Yardeni Research के प्रेसिडेंट एड यार्डेनी का कहना है कि 2029 तक सोने की कीमत 10,000 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकती है।

यह अनुमान उनके लंबे समय के 'Roaring 2020s' नजरिये के मुताबिक है। इसमें उन्होंने अमेरिकी शेयर बाजार के प्रमुख इंडेक्स S&P 500 के लिए भी ऊंचे स्तर का अनुमान जताया है।

फिलहाल कहां खड़ा है सोना


अभी अंतरराष्ट्रीय बाजार में न्यूयॉर्क स्थित COMEX पर सोने की कीमत करीब 4,400 डॉलर प्रति औंस के आसपास चल रही है। 22 दिसंबर को सोना इसी स्तर पर रिकॉर्ड हाई पर पहुंचा था। इस तेजी के पीछे अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से आगे ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद है।

साथ ही, सेफ-हेवन के तौर पर सोने की मजबूत मांग बनी हुई है। डॉलर की कमजोरी को एक अहम फैक्टर माना जा रहा है। साल 2025 में अब तक सोने की कीमतों में करीब 67 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की जा चुकी है।

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3 लाख रुपये के पार जाएगा सोना?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का दाम फिलहाल 4,410 डॉलर प्रति औंस है। अगर सोना 4,410 डॉलर से बढ़कर 10,000 डॉलर प्रति औंस तक जाता है, तो यह करीब 127% की तेजी होगी। इसका मतलब है कि सोने का भाव लगभग ढाई गुना बढ़ जाएगा।

वहीं, भारतीय बाजार की बात करें, तो मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर गोल्ड का रेट (Gold Price Today) 1,35,890 रुपये है। अगर इसमें साल 2029 तक 127% की तेजी आती है, तो भाव करीब 3.08 लाख रुपये होगा।

यार्डेनी को क्यों है सोने पर भरोसा

एड यार्डेनी का कहना है कि निवेश पोर्टफोलियो में सोने की भूमिका आज भी उतनी ही अहम है। उनके मुताबिक, इतिहास बताता है कि जब-जब सोने में बड़ी रैली आई है, वह अक्सर लोगों की उम्मीद से कहीं ज्यादा दूर तक गई है।

उन्होंने साफ कहा कि भले ही छोटे समय में सोना और इक्विटी एक-दूसरे के उलट दिशा में चलते दिखें, लेकिन लंबे समय में दोनों की चाल अक्सर एक जैसी रही है। यही वजह है कि वे सोने को सिर्फ संकट के समय का एसेट नहीं, बल्कि लंबी अवधि का मजबूत निवेश मानते हैं।

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अमेरिकी शेयर बाजार पर नजरिया

अमेरिकी शेयर बाजार को लेकर भी यार्डेनी का रुख पॉजिटिव है। उनका कहना है कि मौजूदा माहौल अब भी बाजार के लिए सपोर्टिव बना हुआ है। उन्हें उम्मीद है कि 2026 के अंत तक S&P 500 इंडेक्स 7,700 के स्तर तक पहुंच सकता है, जो मौजूदा स्तर से करीब 10 प्रतिशत की तेजी को दिखाता है।

यार्डेनी ने यह भी कहा कि इंडेक्स लगातार तीसरे साल डबल-डिजिट रिटर्न की ओर बढ़ रहा है। चौथे साल भी ऐसा प्रदर्शन मुश्किल जरूर है, लेकिन पूरी तरह नामुमकिन नहीं है।

AI सेक्टर में बढ़ती हलचल

यार्डेनी ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े ट्रेड में बढ़ती वोलैटिलिटी की तरफ भी ध्यान दिलाया। बड़े टेक कंपनियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते कैपिटल स्पेंडिंग तेजी से बढ़ रही है।

उनके मुताबिक, इसका असर यह हो सकता है कि टेक सेक्टर की तेजी कुछ गिनी-चुनी मेगा-कैप कंपनियों तक सीमित न रहकर ज्यादा व्यापक हो जाए। यानी आने वाले समय में टेक सेक्टर में लाभ ज्यादा फैला हुआ नजर आ सकता है।

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भारत को लेकर क्या सोचते हैं यार्डेनी

भारत के संदर्भ में यार्डेनी का मानना है कि 2025 कई साल की मजबूत इक्विटी परफॉर्मेंस के बाद कंसोलिडेशन का साल हो सकता है। हालांकि, 2026 में बेहतर मौके बनते दिख रहे हैं। अगर अमेरिका के साथ ट्रेड नेगोशिएशन आगे बढ़ते हैं, तो भारतीय बाजार में नए हाई देखने को मिल सकते हैं।

भारत और चीन दोनों में निवेश के मौके देखने के बावजूद यार्डेनी की पसंद साफ है। उनका कहना है कि वे भारत में निवेश को तरजीह देते हैं, क्योंकि यहां का लीगल और कॉरपोरेट सिस्टम उन्हें चीन की तुलना में ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद लगता है।

ग्लोबल पॉलिसी पर चेतावनी

वैश्विक मौद्रिक नीति को लेकर यार्डेनी ने कहा कि जापान की नीतियों से फिलहाल किसी बड़े वित्तीय संकट का खतरा कम है। लेकिन उन्होंने मिश्रित पॉलिसी सिग्नल को लेकर चेतावनी जरूर दी।

उनका कहना है कि एक साथ सख्त मौद्रिक नीति और फिस्कल स्टिमुलस देना ऐसा है, जैसे कार चलाते वक्त एक पैर ब्रेक पर और दूसरा एक्सेलरेटर पर रखा जाए। उनके मुताबिक, यह किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए लंबी अवधि में सही तरीका नहीं होता।

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