हीटवेव से बढ़ा इन बीमारियों का खतरा, जानिए इंश्योरेंस कवर का फायदा मिलेगा या नहीं
हीटवेव के बीच डिहाइड्रेशन, हीटस्ट्रोक और इंफेक्शन के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसे में हेल्थ इंश्योरेंस कब काम आता है, क्या कवर होता है और किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है, जानिए सबकुछ।
हीट से जुड़ी बीमारियां आम हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी में कवर हो जाती हैं।
देश में हीटवेव तेज हो रही है और इसके साथ डिहाइड्रेशन, हीटस्ट्रोक और इंफेक्शन जैसे खतरे भी बढ़ रहे हैं। डॉक्टरों और इंश्योरेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि गर्मी से जुड़ी बीमारियां सिर्फ सीधे असर तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि कई दूसरी समस्याएं भी पैदा करती हैं।
Howden India में एंप्लॉयी बेनेफिट्स के एसोसिएट प्रेसिडेंट भगत वच्छानेय के मुताबिक, हीटस्ट्रोक, हीट एग्जॉशन और डिहाइड्रेशन इसके सीधे असर हैं। वहीं गैस्ट्रोएंटेराइटिस, फूड पॉइजनिंग और पानी से फैलने वाले इंफेक्शन इसके इनडायरेक्टर असर में आते हैं।
उनका कहना है कि ज्यादा देर तक गर्मी में रहने से दिल और सांस की बीमारियां बिगड़ सकती हैं। कई मामलों में डिहाइड्रेशन इतना बढ़ जाता है कि किडनी पर भी असर पड़ता है।
किन लोगों में ज्यादा खतरा
Probus में लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस की प्रमुख सरिता जोशी कहती हैं कि गर्मियों के पीक समय में अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों में हीटस्ट्रोक, हीट एग्जॉशन और डिहाइड्रेशन के मामले ज्यादा होते हैं। इसके अलावा दूषित खाना और पानी गैस्ट्रोएंटेराइटिस के केस बढ़ाते हैं।
PB Health में प्रिवेंटिव और डिजिटल हेल्थ के चीफ बिजनेस ऑफिसर अरबिंदर सिंघल के मुताबिक, यूरिन इंफेक्शन भी बढ़ते हैं। साथ ही जिन लोगों को पहले से हाइपरटेंशन, डायबिटीज या किडनी की समस्या है, उनमें हालत और बिगड़ सकती है। बुजुर्ग, बच्चे और पहले से बीमार लोग ज्यादा जोखिम में रहते हैं।
हेल्थ इंश्योरेंस में कवरेज कैसे मिलता है
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर हालत गंभीर हो और अस्पताल में भर्ती होना पड़े, तो हीट से जुड़ी बीमारियां आम हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी में कवर हो जाती हैं। इसमें कमरे का किराया, डॉक्टर की फीस, टेस्ट और दवाइयों का खर्च शामिल होता है। लेकिन यह सब पॉलिसी की शर्तों के हिसाब से मिलता है।
वच्छानेय बताते हैं कि ऐसे केस किसी भी दूसरी अचानक होने वाली बीमारी की तरह ट्रीट होते हैं। लेकिन कुछ बातें समझना जरूरी है, जैसे शुरुआती वेटिंग पीरियड, इलाज का जरूरी होना और कई मामलों में न्यूनतम अस्पताल में भर्ती रहने की शर्त।
अगर गर्मी की वजह से पहले से मौजूद बीमारी बढ़ती है, तो क्लेम उसी बीमारी की शर्तों के अनुसार तय होता है।
किन बातों का ध्यान रखना जरूरी
जोशी के मुताबिक, ये बीमारियां आमतौर पर कवर होती हैं, लेकिन लोगों को अपनी पॉलिसी में प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज के वेटिंग पीरियड और लापरवाही से जुड़े एक्सक्लूजन जरूर देख लेने चाहिए।
सिंघल बताते हैं कि हल्के मामलों का इलाज, जैसे सिर्फ डॉक्टर को दिखाना, आमतौर पर कवर नहीं होता, जब तक पॉलिसी में OPD बेनिफिट शामिल न हो।
क्लेम में क्या ट्रेंड दिख रहा है
गर्मियों के दौरान क्लेम बढ़ते जरूर हैं, खासकर उन इलाकों में जहां लंबे समय तक गर्मी रहती है। ये क्लेम ज्यादा तर डिहाइड्रेशन, इंफेक्शन और हीट से जुड़ी जटिलताओं से जुड़े होते हैं।
वच्छानेय के मुताबिक, शुरुआत में ज्यादातर केस OPD लेवल पर ही संभाल लिए जाते हैं। अस्पताल में भर्ती तब होती है जब स्थिति ज्यादा बिगड़ जाती है। वह कहते हैं कि इंश्योरेंस कंपनियां इस तरह के मौसमी ट्रेंड को पहले से अपने सिस्टम में शामिल करती हैं और शुरुआती इलाज से कुल क्लेम खर्च को कंट्रोल करने की कोशिश करती हैं।
क्या प्रीमियम पर असर पड़ता है
जोशी कहती हैं कि गर्मियों में क्लेम बढ़ सकते हैं, लेकिन ये ज्यादातर शॉर्ट टर्म बीमारियां होती हैं। इसलिए इनका प्रीमियम पर तुरंत बड़ा असर नहीं पड़ता।
सिंघल के मुताबिक, प्रीमियम तय करने में मेडिकल इंफ्लेशन, कुल क्लेम और लोगों की उम्र जैसी चीजें ज्यादा अहम होती हैं। हालांकि ऐसे ट्रेंड इंश्योरेंस कंपनियों को प्रिवेंटिव केयर और ग्राहक जागरूकता बढ़ाने पर जोर देने के लिए प्रेरित करते हैं।
बचाव और एड-ऑन का रोल
अगर पॉलिसी में OPD कवर या टेलीकंसल्टेशन जैसी सुविधा है, तो शुरुआती इलाज आसानी से हो सकता है और अस्पताल जाने की जरूरत कम पड़ती है। हेल्थ चेकअप जैसी सुविधाएं भी बीमारियों को पहले पकड़ने में मदद करती हैं।
एक्सपर्ट्स की सलाह है कि खूब पानी पिएं, ज्यादा देर धूप में न रहें और कोई लक्षण दिखे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। साथ ही अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी को समझना और समय-समय पर रिव्यू करना भी जरूरी है, ताकि जरूरत पड़ने पर कोई दिक्कत न आए।
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