Personal Loan: पर्सनल लोन में कैसे बचें ब्याज के बोझ से? जानिए 5-15-25 फॉर्मूला का राज

Personal Loan: पर्सनल लोन को समझदारी से मैनेज करने के लिए 5-15-25 फॉर्मूला अपनाना ज़रूरी है, जिससे EMI, अवधि और लोन राशि संतुलित रहती है। यह नियम ब्याज के बोझ से बचाकर वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है।

अपडेटेड Feb 07, 2026 पर 4:14 PM
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आजकल पर्सनल लोन लेना बेहद आसान हो गया है। मोबाइल ऐप पर कुछ क्लिक करते ही पैसा सीधे आपके अकाउंट में आ जाता है। शादी, मेडिकल इमरजेंसी, छुट्टियां या घर की मरम्मत जैसी ज़रूरतों के लिए लोग अक्सर पर्सनल लोन का सहारा लेते हैं। लेकिन यह सुविधा जितनी आसान है, उतनी ही खतरनाक भी हो सकती है अगर ब्याज का बोझ समय पर नहीं चुकाया गया। इसी समस्या का हल बताता है 5-15-25 फॉर्मूला, जो निवेशकों और आम लोगों को लोन मैनेजमेंट का स्मार्ट तरीका देता है।

इस फॉर्मूले का पहला हिस्सा है 5। इसका मतलब है कि आपकी EMI आपके मासिक वेतन के 5% से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए। अगर EMI आय के मुकाबले बहुत बड़ी होगी तो बाकी ज़रूरी खर्चों पर असर पड़ेगा और वित्तीय दबाव बढ़ेगा।

दूसरा हिस्सा है 15। यानी पर्सनल लोन की अवधि 15 महीने से ज़्यादा नहीं रखनी चाहिए। लंबी अवधि का लोन ब्याज का बोझ बढ़ा देता है। छोटी अवधि में लोन चुकाने से ब्याज कम लगेगा और जल्दी राहत मिलेगी।


तीसरा हिस्सा है 25। इसका मतलब है कि आपकी कुल लोन राशि आपके वार्षिक वेतन के 25% से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए। अगर यह सीमा पार हो जाती है तो कर्ज चुकाना मुश्किल हो सकता है और वित्तीय स्थिरता पर खतरा मंडराने लगता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पर्सनल लोन अनसिक्योर्ड होता है, यानी इसके लिए कोई गारंटी या गिरवी नहीं देनी पड़ती। यही वजह है कि इस पर ब्याज दरें सबसे ज्यादा होती हैं। ऐसे में 5-15-25 फॉर्मूला अपनाने से आप न सिर्फ ब्याज के बोझ से बच सकते हैं बल्कि अपनी वित्तीय स्थिति को भी सुरक्षित रख सकते हैं।

यह फॉर्मूला खासकर उन लोगों के लिए उपयोगी है जो अचानक आने वाली जरूरतों में लोन लेते हैं। यह उन्हें अनुशासन सिखाता है और बताता है कि लोन लेना आसान है, लेकिन उसे सही समय पर चुकाना ही असली समझदारी है।

संक्षेप में, पर्सनल लोन को हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है। अगर आप 5-15-25 नियम को ध्यान में रखते हैं तो न सिर्फ ब्याज का बोझ कम होगा बल्कि आपकी जेब भी सुरक्षित रहेगी। यह फॉर्मूला बताता है कि समझदारी से लिया गया लोन बोझ नहीं बल्कि राहत बन सकता है।

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