LIC लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी के लिए डिपॉजिटरी शुरू कर सकती है। इसके लिए वह अलग सब्सिडियरी बना सकती है। वह इस बारे में इंश्योरेंस रेगुलेटर IRDAI से बातचीत करने वाली है। एलआईसी देश की सबसे बड़ी इंश्योरेस कंपनी है।
LIC लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी के लिए डिपॉजिटरी शुरू कर सकती है। इसके लिए वह अलग सब्सिडियरी बना सकती है। वह इस बारे में इंश्योरेंस रेगुलेटर IRDAI से बातचीत करने वाली है। एलआईसी देश की सबसे बड़ी इंश्योरेस कंपनी है।
एलआईसी को डिपॉजिटरी बिजनेस में बड़े मौके दिख रह हैं। दरअसल, IRDAI ने लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसीज के डीमैटेरियलाइजेशन के लिए डेडलाइन जारी कर दी है। सरकारी और प्राइवेट सभी लाइफ इश्योरेंस कंपनियों के लिए इस साल दिसंबर से इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में पॉलिसी जारी करना अनिवार्य होगा। अभी ये कंपनियां फिजिकल फॉर्म में ग्राहक को पॉलिसी जारी करती हैं। इसके गुम हो जाने, नुकसान पहुंचने, चोरी होने आदि का डर रहता है।
IRDAI के निर्देश के मुताबिक, सभी लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों को अगले साल दिसंबर से सभी मौजूदा या पुरानी पॉलिसी को इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में बदलना शुरू कर देना होगा। इससे ग्राहकों को अपनी पॉलिसी की सुरक्षा नहीं रह जाएगी। शेयरों की तरह लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसीज भी सिर्फ डीमैट फॉर्म में होंगी।
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सीएनबीसी आवाज के मुताबिक, LIC लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी के डीमैटेरियलाइजेशन में बिजनेस का बड़ा मौका देख रही है। लाइफ इंश्योरेंस मार्केट में एलआईसी की करीब 70 फीसदी हिस्सेदारी है। एलआईसी हर साल करीब 2 करोड़ नई पॉलिसी जारी करती है। इसके अलावा पहले जारी की गई उसकी पॉलिसीज की कुल संख्या कम से कम 22 करोड़ है।
देश की सबसे बड़ी लाइफ इंश्योरेंस कंपनी के अपनी पॉलिसीज के डिमैटेरियलाइजेशन पर 1200-1400 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। एलआईसी कमाई के इस मौके को हाथ से निकलने नहीं देना चाहती है। अगर वह अपनी डिपॉजिटरी बनाती है तो उसे न सिर्फ यह रकम हासिल होगी बल्कि वह दूसरी कंपनियों को भी डीमैटेरियलाइजेशन या डीमैट सुविधा देकर बड़ी कमाई कर सकेगी।
देश में बीमा पॉलिसी के लिए डिपॉजिटरी की सुविधा सबसे पहले 2013 में शुरू हुई थी। इसमें 5 इंश्योरेंस रिपॉजिटरीज थीं। इनमें CAMS Repository, Karvy, SHCIL Projects, NSDL Database Management (NDML) और Central Repository of India शामिल हैं। अब इनकी संख्या घटकर चार रह गई है। SHCIL ने रिपॉजिटरी लाइसेंस सरेंडर कर दिया है।
इंश्योरेंस पॉलिसीज का इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म सभी के लिए फायदेमंद था। लेकिन, इसे पॉलिसीहोल्डर्स और इंश्योरेंस कंपनियों का अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला। इसकी वजह कमजोर डिमांड और बीमा कंपनियों के लिए अतिरिक्त लागत थी। दूसरी वजह यह है कि शेयरों की तरह बीमा पॉलिसी का ट्रांजेक्शन ई-इंश्योरंस अकाउंट्स में रेगुलर आधार पर नहीं होता है। इसके वजह से इसकी डिमांड कम होती है। शेयरों के मामले में यह व्यवस्था पहले से लागू है। 99.9 फीसदी इक्विटी ट्रांजेक्शन डीमैट मोड में होते हैं।
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