पश्चिम एशिया में अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच गहराता युद्ध केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं है। इसका असर धीरे धीरे भारत की अर्थव्यवस्था और खास तौर पर हाउसिंग और रियल एस्टेट सेक्टर पर भी पड़ सकता है।
पश्चिम एशिया में अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच गहराता युद्ध केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं है। इसका असर धीरे धीरे भारत की अर्थव्यवस्था और खास तौर पर हाउसिंग और रियल एस्टेट सेक्टर पर भी पड़ सकता है।
भारत अपनी जरूरत का करीब 80 से 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में जब वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो उसका असर महंगाई, निर्माण लागत, ब्याज दरों और घर खरीदने की मांग पर भी पड़ता है। आइए समझते हैं कि इस युद्ध का भारत के रियल एस्टेट बाजार पर क्या असर हो सकता है।
क्या सतर्क हो गया रियल एस्टेट बाजार?
कृष्णा ग्रुप और क्रिसुमी कॉर्पोरेशन के चेयरमैन अशोक कपूर का कहना है कि आर्थिक और वैश्विक हालात का असर लगभग हर उद्योग पर पड़ता है और रियल एस्टेट सेक्टर भी इससे पूरी तरह अलग नहीं है।
उन्होंने कहा, 'निकट अवधि में बाजार में थोड़ी सतर्कता जरूर दिखाई दे सकती है। लेकिन अच्छी लोकेशन, मजबूत क्वालिटी वाली परियोजनाओं और भरोसेमंद डेवलपर्स के प्रोजेक्ट्स में कीमतों का रुख स्थिर और सकारात्मक रह सकता है।'
अशोक कपूर का मानना है कि ऐसे माहौल में खरीदार ज्यादा सोच समझकर निवेश करते हैं। यह फैक्टर रियल एस्टेट बाजार को और अधिक मजबूत बना सकता है।

महंगा तेल बढ़ाएगा घर की लागत?
रियल एस्टेट सेक्टर पर सबसे सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों के जरिए पड़ता है। जब तेल महंगा होता है तो परिवहन, ऊर्जा और निर्माण से जुड़ी कई चीजों की लागत बढ़ जाती है।
रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में इस्तेमाल होने वाली कई चीजें डायरेक्ट या इनडायरेक्ट तौर पर तेल की कीमतों से जुड़ी होती हैं। जैसे सीमेंट, स्टील, प्लास्टिक, पाइप, पेंट और लॉजिस्टिक्स। अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो डेवलपर्स की लागत बढ़ सकती है।
एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसे माहौल में सीमेंट और अन्य निर्माण सामग्री की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। इससे घर बनाने की कुल लागत बढ़ेगी और आगे चलकर इसका असर घरों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
क्या घरों के बढ़ सकते हैं दाम?
तेल महंगा होने का दूसरा बड़ा असर महंगाई के रूप में सामने आता है। जब पेट्रोल, डीजल और ऊर्जा महंगे होते हैं तो रोजमर्रा की चीजें भी महंगी होने लगती हैं। ऐसी स्थिति में लोगों की खर्च करने की क्षमता कम हो सकती है। रियल एस्टेट एक्सपर्ट के मुताबिक, इस माहौल में कई लोग घर खरीदने का फैसला टाल सकते हैं।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि लोग घर खरीदना पूरी तरह बंद कर देंगे। आम तौर पर ऐसे समय में लोग कुछ रणनीतिक बदलाव करते हैं। जैसे:
इसका असर खास तौर पर मिड सेगमेंट और अफोर्डेबल हाउसिंग में ज्यादा दिखाई दे सकता है।

ब्याज दरों पर भी पड़ेगा असर?
अगर तेल की कीमतों की वजह से महंगाई बढ़ती है तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पर ब्याज दरें बढ़ाने या दरों में कटौती टालने का दबाव बढ़ सकता है। रियल एस्टेट बाजार में ब्याज दरों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि ज्यादातर लोग होम लोन लेकर घर खरीदते हैं।
अगर ब्याज दरें बढ़ती हैं तो होम लोन महंगे हो जाते हैं और EMI बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में नए खरीदारों की संख्या कम हो सकती है और बाजार की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ सकती है।
रुपये की कमजोरी की मार
तेल महंगा होने से भारतीय रुपया भी कमजोर हो सकता है। जब रुपया कमजोर होता है तो आयात वाले सामान महंगे हो जाते हैं। इसका असर निर्माण सेक्टर पर भी पड़ता है क्योंकि कई मशीनें, उपकरण और कुछ कच्चा माल विदेशों से आता है।
अगर रुपया कमजोर रहता है तो निर्माण लागत और बढ़ सकती है। इसका असर धीरे धीरे नए प्रोजेक्ट और घरों की कीमतों पर पड़ सकता है।
निवेशकों के व्यवहार में बदलाव
भू राजनीतिक तनाव के समय निवेशकों का व्यवहार भी बदल जाता है। कई बार निवेशक शेयर बाजार जैसे जोखिम वाले निवेश से पैसा निकालकर सुरक्षित विकल्पों की तलाश करते हैं।
ऐसे समय में कुछ निवेशक रियल एस्टेट या सोने जैसे एसेट्स की ओर रुख कर सकते हैं। हालांकि रियल एस्टेट में इसका असर तुरंत नहीं दिखता, लेकिन लंबे समय में निवेश आधारित खरीदारी बढ़ सकती है।
अगर युद्ध लंबा चला तो?
एक्सपर्ट का मानना है कि अगर यह संघर्ष कुछ ही समय में खत्म हो जाता है तो भारत के रियल एस्टेट बाजार पर इसका असर सीमित रहेगा। लेकिन अगर युद्ध लंबा चलता है और तेल की कीमतें 100 से 120 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर बनी रहती हैं, तो इसके असर कई स्तरों पर दिखाई दे सकते हैं।
ऐसी स्थिति में निर्माण लागत बढ़ सकती है, महंगाई तेज हो सकती है, ब्याज दरें ऊंची रह सकती हैं और घर खरीदने की मांग थोड़ी कमजोर पड़ सकती है।
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