भारत में अपना घर होना हर परिवार का सपना है। लेकिन बढ़ती प्रॉपर्टी कीमतों और महंगाई के बीच यह सपना अक्सर डाउन पेमेंट की भारी रकम पर अटक जाता है। कई लोग सोचते हैं कि क्या बिना डाउन पेमेंट के भी घर खरीदा जा सकता है? क्या बैंक 100% होम लोन देते हैं? इस सवाल का जवाब सीधे तौर पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों से जुड़ा है।
RBI का स्पष्ट नियम है कि बैंक किसी भी प्रॉपर्टी की पूरी कीमत यानी 100% फाइनेंस नहीं कर सकते। आमतौर पर बैंक घर की कीमत का 75% से 90% तक ही लोन देते हैं। बाकी रकम खरीदार को डाउन पेमेंट के रूप में खुद जुटानी होती है। उदाहरण के लिए, अगर किसी घर की कीमत ₹50 लाख है, तो बैंक अधिकतम ₹45 लाख तक का लोन देंगे। शेष ₹5 लाख खरीदार को अपनी जेब से देना होगा। यही कारण है कि डाउन पेमेंट को "घर खरीदने की पहली सीढ़ी" कहा जाता है।
हालांकि, कई लोग इस कमी को पूरा करने के लिए पर्सनल लोन, टॉप-अप लोन या NBFCs (नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों) का सहारा लेते हैं। NBFCs कभी-कभी लचीले नियमों के साथ ज्यादा फाइनेंस ऑफर करते हैं, लेकिन ब्याज दरें अपेक्षाकृत ऊंची होती हैं। ऐसे में खरीदार को यह समझना जरूरी है कि ज्यादा लोन लेना मतलब ज्यादा EMI और लंबी वित्तीय जिम्मेदारी।
डाउन पेमेंट क्यों जरूरी है?
- यह बैंक को भरोसा दिलाता है कि खरीदार भी जोखिम साझा कर रहा है।
- डाउन पेमेंट जितना ज्यादा होगा, EMI उतनी कम होगी।
- कम लोन लेने से ब्याज का बोझ घटता है और घर जल्दी चुकता हो जाता है।
- अगर डाउन पेमेंट जुटाना मुश्किल है, तो लोग अपनी बचत, फिक्स्ड डिपॉजिट या गोल्ड लोन का इस्तेमाल कर सकते हैं।
- कुछ सरकारी योजनाएं जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को सब्सिडी देकर राहत देती हैं।
100% होम लोन का सपना सुनने में आकर्षक लगता है, लेकिन हकीकत यह है कि RBI के नियमों के चलते ऐसा संभव नहीं है। घर खरीदने के लिए डाउन पेमेंट करना अनिवार्य है। समझदारी इसी में है कि खरीदार अपनी वित्तीय क्षमता के हिसाब से डाउन पेमेंट की योजना बनाए और लोन उतना ही ले, जितना वह आराम से चुका सके।