शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड में हुआ है भारी नुकसान? तब भी क्यों जरूरी है ITR फाइल करना, जानें टैक्स छूट का यह सीक्रेट फॉर्मूला
ITR Filing 2026: लेकिन टैक्स एक्सपर्ट्स की मानें तो घाटे वाले साल में आईटीआर फाइल न करना लंबे समय में आपको बहुत भारी पड़ सकता है। अगर आप तय समय सीमा के भीतर अपना रिटर्न दाखिल नहीं करते हैं, तो आप अपने इस कैपिटल लॉस को अगले सालों के लिए कैरी फॉरवर्ड का अधिकार खो देते हैं। जानें मार्केट में डूबी रकम कैसे आपको टैक्स में बड़ी राहत दिला सकती है
आईटीआर दाखिल करने से आप इस नुकसान को अगले 8 सालों तक कैरी फॉरवर्ड कर सकते हैं।
ITR Filing Rules: क्या शेयर बाजार में मुनाफे की बजाय नुकसान होने पर इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करना चाहिए? अक्सर देखा जाता है कि जिन निवेशकों को किसी फाइनेंशियल ईयर के दौरान इक्विटी या म्यूचुअल फंड में घाटा होता है, वे मान लेते हैं कि उन्हें ITR फाइल करने की कोई जरूरत नहीं है। खासकर तब, जब उनकी कोई अन्य टैक्स योग्य आय न हो।
लेकिन टैक्स एक्सपर्ट्स की मानें तो घाटे वाले साल में आईटीआर फाइल न करना लंबे समय में आपको बहुत भारी पड़ सकता है। अगर आप तय समय सीमा के भीतर अपना रिटर्न दाखिल नहीं करते हैं, तो आप अपने इस कैपिटल लॉस को अगले सालों के लिए कैरी फॉरवर्ड का अधिकार खो देते हैं।
इसका सीधा असर यह होगा कि भविष्य में जब आपको प्रॉफिट होगा, तब आप इस घाटे को उस मुनाफे से एडजस्ट नहीं कर पाएंगे और आपको ज्यादा टैक्स चुकाना पड़ेगा। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि नुकसान के बावजूद आईटीआर भरना क्यों फायदेमंद है।
लॉस कैरी फॉरवर्ड करने का क्या है नियम?
टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, नुकसान के बावजूद समय पर आईटीआर भरने से आपको अपने नुकसान को भविष्य के मुनाफे से एडजस्ट करने की कानूनी अनुमति मिलती है। एनए शाह एसोसिएट्स के टैक्स पार्टनर गोपाल बोहरा बताते हैं कि भले ही किसी टैक्सपेयर की कोई टैक्स देनदारी न बन रही हो और सिर्फ इक्विटी या म्यूचुअल फंड से कैपिटल लॉस हुआ हो, तब भी ड्यू डेट पर या उससे पहले आईटीआर फाइल करना बेहद फायदेमंद है।
समय पर आईटीआर दाखिल करने से आप इस नुकसान को अगले 8 सालों तक कैरी फॉरवर्ड कर सकते हैं। भविष्य के सालों में जब भी आपको शेयरों या म्यूचुअल फंड से कमाई होगी, तो आप इस पुराने घाटे को उस मुनाफे से घटाकर अपनी टैक्स देनदारी को काफी कम या शून्य कर सकते हैं।
क्या इक्विटी, डेट म्यूचुअल फंड और गोल्ड ETF के नियम अलग हैं?
कई निवेशकों को लगता है कि यह नियम सिर्फ शेयरों के लिए है, लेकिन टैक्स एक्सपर्ट्स ने साफ किया है कि निवेश का माध्यम कोई भी हो, नियम सभी के लिए बिल्कुल एक समान हैं। चाहे आपका नुकसान इक्विटी शेयर्स से हुआ हो, इक्विटी म्यूचुअल फंड से हो, डेट म्यूचुअल फंड से हो या फिर गोल्ड ईटीएफ से, अगर आप इस अन-एडजस्टेड लॉस को आगे ले जाना चाहते हैं, तो आपको तय तारीख के भीतर ही आईटीआर भरना होगा। नियत तारीख चूकने पर घाटे को आगे ले जाने की अनुमति नहीं मिलेगी।
इक्विटी के घाटे को क्या दूसरे एसेट्स के मुनाफे से एडजस्ट कर सकते हैं?
हां, नियमों के दायरे में रहकर आप इक्विटी के घाटे को दूसरे कैपिटल एसेट्स से हुए मुनाफे के खिलाफ एडजस्ट कर सकते हैं और अपना टैक्स बचा सकते हैं:
शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस(STCL): अगर आपको शेयरों से शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस हुआ है, तो इसे आप शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म दोनों तरह के कैपिटल गेन्स से एडजस्ट कर सकते हैं। फिर चाहे वह मुनाफा शेयरों से हो, प्रॉपर्टी बेचने से हो, गोल्ड से हो या डेट म्यूचुअल फंड से।
लॉन्ग-टर्म कैपिटल लॉस(LTCL): अगर आपको शेयरों में लंबी अवधि में घाटा हुआ है, तो नियम कड़े हैं। इसे केवल और केवल लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) के खिलाफ ही एडजस्ट किया जा सकता है।
निवेशकों को कौन सा ITR फॉर्म चुनना चाहिए?
सही आईटीआर फॉर्म का चुनाव पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी कमाई या नुकसान के स्रोत क्या हैं:
ITR-2: जो निवेशक शेयरों, म्यूचुअल फंड या अन्य कैपिटल एसेट्स से होने वाले केवल कैपिटल गेन्स या कैपिटल लॉस को रिपोर्ट कर रहे हैं, उन्हें आमतौर पर ITR-2 फॉर्म भरना होता है।
ITR-3: लेकिन, अगर आप शेयरों में इंट्राडे ट्रेडिंग करते हैं या फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) में ट्रेड करते हैं, जिसे टैक्स की भाषा में बिजनेस इनकम माना जाता है, तो आपको ITR-3 फॉर्म चुनना चाहिए।
कैपिटल लॉस रिपोर्ट करते समय किन बातों का रखें ध्यान?
टैक्सपेयर्स को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि केवल वही नुकसान आगे ले जाए जा सकते हैं जो समय सीमा के भीतर फाइल किए गए रिटर्न में दिखाए गए हों। इसके अलावा, अपने कॉन्ट्रैक्ट नोट्स, ब्रोकर स्टेटमेंट्स और कैपिटल गेन्स स्टेटमेंट्स जैसे सभी जरूरी दस्तावेजों को संभालकर रखें, क्योंकि टैक्स अधिकारियों द्वारा मांगे जाने पर ये सबूत के तौर पर काम आते हैं।
गोपाल बोहरा सलाह देते हैं कि आईटीआर दाखिल करने से पहले निवेशकों को अपने AIS और TIS में दर्ज ट्रांजैक्शन का मिलान अपने ब्रोकर की रिपोर्ट से जरूर कर लेना चाहिए। आईटीआर में शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म नुकसान का सही खुलासा सुनिश्चित करें ताकि भविष्य में टैक्स छूट का लाभ लेने में कोई रुकावट न आए।
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