Kisan Credit Card: KCC का लोन नहीं चुकाया, तो नीलाम हो जाएगी जमीन? जानिए क्या हैं किसानों के अधिकार

Kisan Credit Card: KCC के तहत काफी सस्ता लोन मिल जाता है। लेकिन, डिफॉल्ट होने पर जमीन की नीलामी हो सकती है। इसके लिए बैंकों को अदालत से इजाजत लेने की भी जरूरत नहीं। जानिए किसानों के अधिकार और नीलामी से बचने के विकल्प।

अपडेटेड Apr 21, 2026 पर 3:56 PM
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जमीन नीलामी बैंक का पहला कदम नहीं, बल्कि आखिरी विकल्प होता है। (सांकेतिक तस्वीर)

Kisan Credit Card: किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) के जरिए किसानों को काफी रियायती दर पर ब्याज मिल जाता है। इससे वे खाद, बीज और सिंचाई के साथ अन्य खर्चों चला सकते हैं।

लेकिन, कभी-कभी किसान वित्तीय चुनौतियों के वजह से लोन पर डिफॉल्ट कर जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बैंक किसान की जमीन नीलाम कर सकता है? इसका जवाब जानेंगे, लेकिन पहले किसान क्रेडिट योजना को समझ लेते हैं।

क्या है किसान क्रेडिट कार्ड


KCC योजना 1998 में शुरू की। इसका मकसद था कि किसानों को साहूकारों के चंगुल से निकालकर सीधे बैंकिंग सिस्टम से जोड़ा जा सके।

इस कार्ड के जरिए किसान जरूरत के हिसाब से पैसा निकाल सकते हैं और खेती में खर्च कर सकते हैं। यह एक तरह का फ्लेक्सिबल लोन होता है। इसमें बार-बार आवेदन करने की जरूरत नहीं पड़ती। आप हर साल पुराना लोन चुका नया ले सकते हैं।

कितना लोन, किस ब्याज पर?

आमतौर पर किसानों को ₹50 हजार से ₹3 लाख तक का लोन मिलता है। यह उनकी जमीन, फसल और जरूरत के हिसाब से बढ़ भी सकता है। लोन चुकाने की अवधि फसल के सीजन- रबी या खरीफ के हिसाब से तय होती है। यह आमतौर पर 6 महीने से 1 साल होती है।

अगर किसान समय पर भुगतान करता है, तो उसे ब्याज में 3% तक की छूट मिलती है। इससे प्रभावी ब्याज दर करीब 4% तक आ सकती है। अगर आप होम लोन से तुलना करना चाहे, तो सबसे सस्ता होम लोन भी 7% से ऊपर मिलता है। पर्सनल लोन तो 10 से 25% तक चला जाता है।

डिफॉल्ट होने पर बैंक क्या करता है

अगर किसान तय समय पर लोन नहीं चुका पाता, तो सबसे पहले बैंक रिमाइंडर और नोटिस भेजता है। अगर 90 दिनों तक भुगतान नहीं होता, तो खाता NPA (Non-Performing Asset) घोषित कर दिया जाता है।

इसके बाद रिकवरी की प्रक्रिया शुरू होती है। इसमें पहले समझौते की कोशिश की जाती है, फिर कानूनी नोटिस जारी होता है।

जमीन जब्ती और नीलामी की प्रक्रिया

जब सभी विकल्प खत्म हो जाते हैं, तब मामला प्रशासन तक पहुंचता है। तहसीलदार इसे राजस्व बकाया मानकर वसूली शुरू करता है और जरूरत पड़ने पर जमीन कुर्क की जा सकती है। अगर इसके बाद भी पैसा नहीं चुकाया जाता, तो बैंक जमीन नीलाम करने का फैसला ले सकता है।

नीलामी से पहले सार्वजनिक नोटिस दिया जाता है और किसान को आखिरी मौका मिलता है। नीलामी से मिली रकम से लोन वसूला जाता है और बची रकम किसान को लौटा दी जाती है। यह पूरी प्रक्रिया SARFAESI Act, 2002 के तहत होती है। इसमें बैंक को बिना अदालत की अनुमति के भी कार्रवाई करने का अधिकार होता है।

किन परिस्थितियों में मिल सकती है राहत

हर डिफॉल्ट का मतलब जमीन नीलामी नहीं होता। अगर फसल बाढ़, सूखा या अन्य प्राकृतिक आपदा से खराब हुई हो, या सरकार ने लोन माफी या राहत पैकेज की घोषणा की हो, तो किसान को राहत मिल सकती है।

छोटे और सीमांत किसानों (5 एकड़ से कम जमीन) के मामलों में भी कई बार नरमी बरती जाती है। इसके अलावा, अगर फसल बीमा का पैसा मिलना बाकी हो, तो भी नीलामी टल सकती है।

किसान के पास क्या विकल्प रहते हैं

अगर स्थिति गंभीर हो जाए, तब भी किसान के पास रास्ते खत्म नहीं होते। वह बैंक से लोन री-स्ट्रक्चरिंग या वन टाइम सेटलमेंट की मांग कर सकता है।

अगर बैंक ने नियमों का पालन नहीं किया है, तो किसान Debt Recovery Tribunal (DRT) या कोर्ट में अपील कर सकता है। जरूरत पड़ने पर स्टे ऑर्डर लेकर नीलामी को अस्थायी रूप से रोका भी जा सकता है।

आखिरी और सबसे जरूरी बात

जमीन नीलामी बैंक का पहला कदम नहीं, बल्कि आखिरी विकल्प होता है। बैंक भी चाहता है कि पैसा वापस आए, न कि जमीन अपने पास रखे।

इसलिए अगर लोन चुकाने में दिक्कत आ रही है, तो सबसे सही तरीका है- समय रहते बैंक से बात करना और समाधान निकालना। यही कदम किसान को अपनी जमीन बचाने में सबसे ज्यादा मदद करता है।

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