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Market Correction vs SIP: मार्केट क्रैश का इंतजार पड़ सकता है भारी! जानें क्यों एक्सपर्ट्स दे रहे हैं हर महीने SIP की सलाह

SIP vs Cash Deployment Strategy: बाजार में सुधार आने या क्रैश होने का इंतजार करने का सबसे बड़ा रिस्क यह है कि बाजार हमेशा उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से रिकवर करता है। इतिहास गवाह है कि शेयर बाजार में सबसे बड़ी और सबसे तेज बढ़त अक्सर एक बहुत तेज गिरावट के तुरंत बाद आती है

Curated By: Abhishek Guptaअपडेटेड Jul 20, 2026 पर 1:38 PM
Market Correction vs SIP: मार्केट क्रैश का इंतजार पड़ सकता है भारी! जानें क्यों एक्सपर्ट्स दे रहे हैं हर महीने SIP की सलाह
हर कोई चाहता है कि वह बाजार के बिल्कुल निचले स्तर यानी बॉटम पर शेयर या म्यूचुअल फंड खरीदे

Market Crash Timing vs SIP Strategy: हर निवेशक के मन में कभी न कभी यह विचार जरूर आता है कि 'जब मार्केट गिरेगा, तब पैसा लगाऊंगा'। सुनने में यह रणनीति बहुत समझदारी भरी लगती है कम कीमत पर खरीदो और बंपर मुनाफा कमाओ। लेकिन शेयर बाजार की सबसे बड़ी हकीकत यह है कि बाजार कभी ढिंढोरा पीटकर नहीं गिरता और न ही बढ़ता है।

भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव का दौर लगातार जारी है। ऐसे में निवेशकों के बीच एक पुरानी बहस फिर से छिड़ गई है क्या हर महीने SIP के जरिए निवेश करनी चाहिए, या फिर कैश बचाकर रखना चाहिए और बाजार में बड़ी गिरावट आने पर ही एकमुश्त पैसा लगाना चाहिए? आइए इसे समझते हैं।

बीते वक्त को देखना आसान है, बॉटम पकड़ना नामुमकिन

हर कोई चाहता है कि वह बाजार के बिल्कुल निचले स्तर यानी बॉटम पर शेयर या म्यूचुअल फंड खरीदे। लेकिन दिक्कत यह है कि जब बाजार गिर रहा होता है, तब कोई नहीं बता सकता कि बॉटम कहां है। बाजार कभी सीधी लकीर में नहीं चलता। अगर मार्केट 10% गिर चुका है, तो वहां से वह 10% और गिर सकता है या वहीं से रिकवरी शुरू कर सकता है।

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