No Cost EMI: नो-कॉस्ट EMI अब भारत के ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स पर लगभग डिफॉल्ट ऑप्शन बन चुकी है। मोबाइल फोन, लैपटॉप, होम अप्लायंसेज, यहां तक कि फर्नीचर भी एक ही वादे के साथ बेचे जा रहे हैं- बिना ब्याज दिए आसान किस्तों में भुगतान।
No Cost EMI: नो-कॉस्ट EMI अब भारत के ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स पर लगभग डिफॉल्ट ऑप्शन बन चुकी है। मोबाइल फोन, लैपटॉप, होम अप्लायंसेज, यहां तक कि फर्नीचर भी एक ही वादे के साथ बेचे जा रहे हैं- बिना ब्याज दिए आसान किस्तों में भुगतान।
कई खरीदारों को यह बढ़िया रास्ता भी लगता है। न एकमुश्त बड़ी रकम देनी पड़ती है और न ही सेविंग्स को हाथ लगाना पड़ता है। लेकिन असलियत अक्सर इससे ज्यादा उलझी होती है।
No Cost EMI क्या होती है?
टैक्समैनेजर.इन के फाउंडर और सीईओ दीपक कुमार जैन के मुताबिक, नो-कॉस्ट EMI का मतलब यह होता है कि जब आप कोई प्रोडक्ट किस्तों में खरीदते हैं, तो आपसे सीधे तौर पर ब्याज नहीं लिया जाता। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि यह सुविधा पूरी तरह मुफ्त होती है।
उनका कहना है, 'असल में नो-कॉस्ट EMI में ब्याज या अतिरिक्त चार्जेज को अलग तरीके से एडजस्ट किया जाता है। अक्सर यह रकम डिस्काउंट के रूप में पहले ही काट ली जाती है या फिर सेलर और प्लेटफॉर्म उसे वहन करते हैं। यानी ग्राहक को ब्याज अलग से चुकाना नहीं दिखता, लेकिन उसकी लागत कहीं न कहीं पहले से ही कीमत में शामिल होती है।'

'नो-कॉस्ट' असल में काम कैसे करता है
ज्यादातर मामलों में EMI पर ब्याज होता है। फर्क बस इतना है कि यह ब्याज ग्राहक से सीधे नहीं लिया जाता। आमतौर पर सेलर या प्लेटफॉर्म उस ब्याज की रकम को एक तरह से डिस्काउंट के रूप में दिखाता है।
यही डिस्काउंट बाद में EMI अवधि के दौरान बैंक द्वारा लगाए गए ब्याज के खिलाफ एडजस्ट कर दिया जाता है। कागजों पर सब कुछ बराबर दिखता है, लेकिन असली डील कई बार चुपचाप बदल जाती है।
वो चीज, जो आपको दिखती नहीं
नो-कॉस्ट EMI का सबसे आम पेंच वही डिस्काउंट है, जो नजर नहीं आता। जैसे ही आप EMI चुनते हैं, कई प्लेटफॉर्म इंस्टेंट कार्ड डिस्काउंट, कैशबैक ऑफर या फेस्टिव प्राइस कट हटा देते हैं।
मान लीजिए कोई प्रोडक्ट 50,000 रुपये का है। अगर आप पूरा भुगतान करें तो 4,000 रुपये का सीधा डिस्काउंट मिल रहा है। लेकिन जैसे ही आप नो-कॉस्ट EMI चुनते हैं, वही डिस्काउंट घटकर 2,500 रुपये रह जाता है।
हर महीने की EMI हल्की लगती है, लेकिन असल में आप उसी प्रोडक्ट के लिए पहले ही ज्यादा कीमत चुका चुके होते हैं।
बाद में सामने आने वाले चार्ज
ज्यादातर बैंक खरीदारी को EMI में बदलने के लिए प्रोसेसिंग फीस लेते हैं। यह रकम छोटी लग सकती है, लेकिन महंगे प्रोडक्ट्स पर यह अच्छी-खासी हो जाती है।
इसके अलावा EMI के ब्याज वाले हिस्से पर GST भी लगता है, भले ही वह ब्याज कहीं और से 'एडजस्ट' किया जा रहा हो। ये चार्ज आमतौर पर सामने साफ तौर पर नहीं दिखते।
अक्सर ग्राहक इन्हें या तो टर्म्स एंड कंडीशंस में गहराई से पढ़ने पर समझ पाते हैं या फिर पहली क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट आने पर।

क्रेडिट प्रोफाइल पर क्या होता है असर
हर EMI एक खरीदारी को लोन में बदल देती है। एक-दो EMI होना आम बात है, लेकिन अगर कई EMI एक साथ चल रही हों, तो आपका कुल क्रेडिट एक्सपोजर बढ़ जाता है।
इसका असर तब दिख सकता है, जब आप भविष्य में होम लोन, कार लोन या ज्यादा क्रेडिट लिमिट के लिए अप्लाई करते हैं। यही वजह है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया रोजमर्रा के खर्च के लिए शॉर्ट-टर्म कंज्यूमर क्रेडिट पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता को लेकर बार-बार चेतावनी देता रहा है।
कब नो-कॉस्ट EMI रहेगी समझदारी
नो-कॉस्ट EMI हर बार गलत विकल्प नहीं है। अगर फुल पेमेंट पर कोई खास डिस्काउंट नहीं मिल रहा, प्रोसेसिंग फीस कम है और किस्तों में भुगतान करने से आपका कैश फ्लो बेहतर तरीके से मैनेज हो जाता है, तो यह एक ठीक विकल्प हो सकता है।
लेकिन यहां सबसे जरूरी चीज तुलना है। हमेशा देखें कि पूरा भुगतान करने पर आपकी कुल लागत कितनी बन रही है और EMI के जरिए आप असल में कितना चुका रहे हैं। इसमें फीस और छूट का नुकसान दोनों शामिल करें।
इन बातों का हमेशा रखें ध्यान
नो-कॉस्ट EMI कोई धोखा नहीं है, लेकिन यह अपने आप में कोई खास डील भी नहीं है। यह सुविधा है, मुफ्त पैसा नहीं।
खरीदारी से पहले थोड़ा रुकिए, आंकड़ों को ध्यान से देखिए और तय कीजिए कि आप सच में सुविधा खरीद रहे हैं या किसी और रूप में उसकी कीमत चुका रहे हैं। अगर सबकुछ सही लगे, तभी आगे बढ़ें।
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