Old vs New Tax Regime Deduction Calculator: इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने का समय आते ही हर नौकरीपेशा और टैक्सपेयर के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है ओल्ड टैक्स रिजीम बेहतर है या न्यू टैक्स रिजीम?

Old vs New Tax Regime Deduction Calculator: इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने का समय आते ही हर नौकरीपेशा और टैक्सपेयर के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है ओल्ड टैक्स रिजीम बेहतर है या न्यू टैक्स रिजीम?
टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह चुनाव सिर्फ टैक्स स्लैब देखकर नहीं किया जा सकता। यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आप ओल्ड टैक्स रिजीम में कितना निवेश दिखा रहे हैं। सही फैसला लेने का सबसे आसान तरीका है 'ब्रेक-ईवन डिडक्शन' को समझना। यह वह जादुई आंकड़ा है, जहां दोनों ही टैक्स सिस्टम में आपकी टैक्स देनदारी बिल्कुल बराबर हो जाती है। आइए समझते हैं कि आपकी सैलरी के हिसाब से यह आंकड़ा कितना है।
क्या है ब्रेक-ईवन डिडक्शन?
आसान शब्दों में, ब्रेक-ईवन डिडक्शन एक 'थ्रेशोल्ड सीमा' है। अगर आपका निवेश इस सीमा से कम है तो आपके लिए न्यू टैक्स रिजीम ज्यादा फायदेमंद रहेगी और उसमें टैक्स कम लगेगा। वहीं अगर आपका निवेश इस सीमा से ज्यादा है तो आपके लिए ओल्ड टैक्स रिजीम ही बेहतर विकल्प साबित होगी।
सैलरी के हिसाब से देखें ब्रेक-ईवन डिडक्शन की पूरी लिस्ट
टैक्स एक्सपर्ट्स के अनुसार, अलग-अलग आय के स्तर पर ब्रेक-ईवन डिडक्शन का आंकड़ा इस प्रकार है:
उदाहरण के लिए: अगर आपकी सालाना आय ₹12.5 लाख है, तो दोनों टैक्स रिजीम को बराबर करने के लिए आपको ओल्ड रिजीम में ₹4.75 लाख का कुल निवेश दिखाना होगा। अगर आपका निवेश ₹4.75 लाख से कम (जैसे- ₹3 लाख) है, तो न्यू रिजीम चुनिए। अगर निवेश इससे ज्यादा है, तो ओल्ड रिजीम में रहिए।
ओल्ड रिजीम का कैलकुलेशन करते समय किन कटौतियों को जोड़ें?
HJ अग्रवाल एंड कंपनी के पार्टनर हर्षित अग्रवाल के मुताबिक, तुलना करने से पहले टैक्सपेयर्स को ओल्ड टैक्स रिजीम के तहत मिलने वाले सभी वैध निवेशों और छूटों को आपस में जोड़ लेना चाहिए। इनमें शामिल हैं:
सेक्शन 80C: PPF, EPF, ELSS (म्यूचुअल फंड), और लाइफ इंश्योरेंस प्रीमियम (अधिकतम ₹1.5 लाख)।
सेक्शन 80D: खुद और परिवार के लिए हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम।
सेक्शन 80CCD(1B): एनपीएस में ₹50,000 का अतिरिक्त स्वैच्छिक योगदान।
सेक्शन 24(b): होम लोन के ब्याज पर ₹2 लाख तक की छूट।
अन्य छूट: सेक्शन 80G (दान) और सेक्शन 80E (एजुकेशन लोन का ब्याज)।
एक्सपर्ट टिप: ध्यान रखें कि कंपनी की तरफ से एनपीएस में किया जाने वाला योगदान (सेक्शन 80CCD(2)) और स्टैंडर्ड डिडक्शन का लाभ दोनों ही रिजीम में मिलता है, इसलिए इन्हें केवल ओल्ड रिजीम का हिस्सा मानकर गणना में न जोड़ें।
शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स वाले रहें सावधान
हर्षित अग्रवाल ने एक जरूरी तकनीकी पहलू की ओर भी ध्यान दिलाया है। न्यू टैक्स रिजीम में मिलने वाला सेक्शन 87A का रिबेट उन आय पर लागू नहीं होता है जिन पर स्पेशल रेट से टैक्स लगता है।
जैसे- सेक्शन 111A के तहत शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स (STCG) या सेक्शन 112A के तहत लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG)।
इसलिए, अगर आपकी ऐसी कोई कमाई है, तो आंख बंद करके न्यू रिजीम में जीरो टैक्स न मान लें, बल्कि सीए की मदद से सटीक कैलकुलेशन करें।
दूसरों की देखा-देखी न लें फैसला
चार्टर्ड अकाउंटेंट श्रेया गुप्ता गोयल का कहना है कि टैक्सपेयर्स को कभी भी धारणाओं के आधार पर या दूसरों की देखा-देखी टैक्स रिजीम नहीं चुननी चाहिए। चूंकि हर साल केंद्रीय बजट के जरिए टैक्स स्लैब्स, रिबेट और डिडक्शंस के नियमों में बदलाव हो सकता है, इसलिए पिछले साल के अनुमानों पर भरोसा करने के बजाय हर साल अपना ITR फाइल करने से ठीक पहले नए सिरे से ब्रेक-ईवन पॉइंट की गणना जरूर करें। वही टैक्स रिजीम सबसे बेस्ट है, जो आपके कैलकुलेटर में भ्रम नहीं, बल्कि आपकी जेब में ज्यादा पैसा छोड़े।
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