रिटायरमेंट के लिए ₹1 करोड़ का टारगेट सुनते ही अक्सर लगता है कि यह बहुत बड़ा सपना है। लेकिन, हकीकत में इतना मुश्किल भी नहीं। बस सवाल यह है कि आप निवेश की शुरुआत कब करते हैं।

रिटायरमेंट के लिए ₹1 करोड़ का टारगेट सुनते ही अक्सर लगता है कि यह बहुत बड़ा सपना है। लेकिन, हकीकत में इतना मुश्किल भी नहीं। बस सवाल यह है कि आप निवेश की शुरुआत कब करते हैं।
अगर जल्दी शुरू करते हैं तो कंपाउंडिंग आपका सबसे बड़ा साथी बनती है। लेकिन, जितना देर करेंगे, परेशानी और निवेश की रकम उतनी ही बढ़ती जाएगी। क्योंकि फिर कंपाउंडिंग आपके खिलाफ काम करने लगती है। ऐसे में समझना जरूरी है कि देरी की कीमत आखिर कितनी भारी पड़ती है।
जल्दी शुरुआत करने के फायदे
अब मान लीजिए आपका टारगेट 1 करोड़ रुपये है और आप औसतन 12% सालाना रिटर्न मानकर चल रहे हैं। जैसा कि इक्विटी म्यूचुअल फंड में लंबे समय में देखा जाता है। अगर कोई शख्स 20 साल की उम्र में निवेश शुरू करता है, तो वो करीब 25 साल में अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है।
आपको हर महीने करीब 6,000 से 7,000 रुपये निवेश करने होंगे। यह रकम संभालने लायक लगती है। इसे समय के साथ बढ़ाना भी आसान रहता है।
अगर 5 साल देर से शुरुआत करें
अगर आप 20 की बजाय 25 साल की उम्र में शुरुआत करते हैं, तो आपके पास 20 साल का समय बचता है। इस स्थिति में हर महीने करीब 10,000 से 11,000 रुपये निवेश करने होंगे। यानी सिर्फ 5 साल की देरी ने आपका मासिक निवेश लगभग डेढ़ गुना कर दिया। यह बढ़ोतरी दिखने में छोटी लग सकती है, लेकिन लंबे समय में इसका असर काफी बड़ा होता है।
10 साल की देरी पर क्या होगा
अब अगर 1 करोड़ के लक्ष्य के साथ 30 साल की उम्र में शुरुआत करेंगे, तो मुश्किल बढ़ जाएगी। आपके पास समय घटकर 15 साल रह जाता है। यहां से पूरा कैलकुलेशन बदल जाता है। अब हर महीने करीब 18,000 से 20,000 रुपये निवेश करने पड़ेंगे। यानी सिर्फ 10 साल की देरी ने मासिक निवेश को लगभग तीन गुना कर दिया।
अगर 15 साल देर से शुरुआत करें
अगर शुरुआत 35 साल की उम्र में होती है, तो आपके पास सिर्फ 10 साल का समय बचता है। इस स्थिति में हर महीने करीब 40,000 से 45,000 रुपये निवेश करने पड़ सकते हैं। यानी 15 साल की देरी ने निवेश को कई गुना बढ़ा दिया। यह रकम ज्यादातर लोगों के लिए काफी भारी पड़ सकती है। यहां अनुशासन के साथ-साथ बात आपकी सैलरी और दूसरे खर्चों की भी आ जाती है।
कंपाउंडिंग का असर कैसे बदलता है
कंपाउंडिंग शुरुआत में बहुत बड़ा असर नहीं दिखाती। शुरुआती सालों में ग्रोथ धीमी लगती है। लेकिन जैसे-जैसे समय बढ़ता है, खासकर आखिरी 8 से 10 साल में ग्रोथ तेजी से बढ़ती है। जो लोग जल्दी शुरू करते हैं, उन्हें इस तेजी का पूरा फायदा मिलता है।
दूसरी तरफ, जो लोग देर से शुरू करते हैं, वे इस बड़े ग्रोथ वाले हिस्से का एक बड़ा भाग मिस कर देते हैं। इसलिए उन्हें ज्यादा पैसा लगाना पड़ता है, लेकिन समय कम होने की वजह से उतना फायदा नहीं मिल पाता।
देरी की कीमत सिर्फ पैसे में नहीं होती
10 साल देर से शुरू करने का असर सिर्फ निवेश की रकम पर नहीं पड़ता, बल्कि मानसिक और फाइनेंशियल दबाव भी बढ़ जाता है। हर महीने 20 या 40 हजार रुपये निवेश करना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। खासकर जब घर के खर्च, बच्चों की पढ़ाई और दूसरी जिम्मेदारियां साथ हों।
कई बार लोग जल्दी लक्ष्य पाने के चक्कर में ज्यादा जोखिम ले लेते हैं। वे ऐसे प्रोडक्ट्स में पैसा लगा देते हैं जो बहुत हाई रिटर्न का वादा करते हैं, लेकिन उनमें नुकसान का खतरा भी ज्यादा होता है।
अगर देर हो गई है तो क्या करें
अगर आपने देर से शुरुआत की है, तो इसका मतलब यह नहीं कि आपका करोड़पति बनने का सपना पूरा नहीं होगा। लेकिन आपको अपनी स्ट्रैटेजी बदलनी होगी। सबसे पहले निवेश की रकम बढ़ानी होगी। इसके साथ ही नियमितता यानी डिसिप्लिन बहुत जरूरी हो जाता है।
एक अच्छा तरीका यह है कि हर साल अपनी SIP को 5 से 10 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए। इसे स्टेप-अप SIP कहते हैं। इससे धीरे-धीरे आपका निवेश बढ़ता है और लक्ष्य तक पहुंचना आसान हो जाता है।
आपको अपने पोर्टफोलियो में इक्विटी का हिस्सा थोड़ा ज्यादा रखना पड़ सकता है, ताकि बेहतर रिटर्न मिल सके। हालांकि, यह पूरी तरह आपकी जोखिम लेने की क्षमता पर निर्भर करता है।
समय की ताकत को पहचानना जरूरी
1 करोड़ का टारगेट हासिल करना मुश्किल नहीं है, लेकिन इसमें समय सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। जितनी जल्दी शुरुआत करेंगे, उतना कम बोझ पड़ेगा। और जितनी देर करेंगे, उतना ज्यादा निवेश करना पड़ेगा।
इसलिए सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि कितना पैसा लगाना है, बल्कि यह है कि शुरुआत कब करनी है। क्योंकि निवेश में सबसे सही समय हमेशा आज ही होता है।
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