चांदी की कीमत रिकॉर्ड ऊंचाई से 55% फिसली, क्या यह पैसे लगाने का सही वक्त है?
इस साल जनवरी के आखिर में अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी की कीमत 117 डॉलर प्रति औंस पहुंच गई थी। अभी भाव 52 डॉलर प्रति औंस चल रहा है। भारत में भी सिल्वर फ्यूचर्स में इस दौरान बड़ी गिरावट देखने को मिली है
29 अक्तूबर को 12 बजे एमसीएक्स में सिल्वर फ्यूचर्स 1,91,967 रुपये प्रति किलोग्राम चल रहा था।
चांदी की कीमतें इस साल जनवरी के अंत में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई थीं। 28 जनवरी, 2026 को अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी का भाव 117 डॉलर प्रति औंस था। 29 अक्तूबर को भाव 52.68 डॉलर प्रति औंस चल रहा था। इसका मतलब है कि सिल्वर जनवरी के लेवल से 55 फीसदी गिर चुका है।
भारत में भी सिल्वर फ्यूचर्स में बड़ी गिरावट
भारत में सिल्वर फ्यूचर्स में भी बड़ी गिरावट आई है। जनवरी के आखिर में एमसीएक्स पर सिल्वर फ्यूचर्स 3,84,632 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया था। 29 अक्तूबर को 12 बजे एमसीएक्स में सिल्वर फ्यूचर्स 1,91,967 रुपये प्रति किलोग्राम चल रहा था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सिल्वर के प्राइस ट्रेंड का असर घरेलू बाजार पर भी दिखा।
गिरावट के बावजूद सितंबर में निवेश 55% बढ़ा
इस गिरावट के बावजूद चांदी में इनवेस्टर्स की दिलचस्पी बनी हुई है। इस साल सितंबर में सिल्वर एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) में 1,974 करोड़ रुपये का निवेश आया। यह अगस्त के मुकाबले 55 फीसदी ज्यादा है। यह जानकारी AMFI के डेटा पर आधारित है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि चांदी पर दांव लगाने के लिए सिल्वर ईटीएफ अच्छा जरिया है।
सिल्वर ईटीएफ कैसे काम करता है
सिल्वर ईटीएफ इनवेस्टर्स को फिजिकल चांदी खरीदे बगैर इस पर दांव लगाने की सुविधा देता है। म्यूचुअल फंड्स की सिल्वर ईटीएफ स्कीम इनवेस्टर्स के पैसे से 99.9 प्योरिटी की फिजिकल चांदी खरीदती है। वह इसके बदले में इनवेस्टर्स को सिल्वर ईटीएफ की यूनिट्स इश्यू करती है। यूनिट्स की वैल्यू घरेलू बाजार में चांदी की कीमतों से लिंक्ड होती है।
स्टॉक एक्सचेंजों पर यूनिट्स की ट्रेडिंग
सिल्वर ईटीएफ की यूनिट्स की ट्रेडिंग शेयरों की तरह स्टॉक एक्सचेंजों पर होती है। इसलिए सिल्वर ईटीएफ में निवेश करने के लिए डीमैट और ट्रेडिंग अकाउंट जरूरी होते हैं। इनवेस्टर के सिल्वर ईटीएफ में निवेश करने पर एसेट मैनेजमेंट कंपनी उसके डीमैट अकाउंट में यूनिट्स ट्रांसफर कर देती है।
लंबी अवधि के निवेशक होल्ड कर सकते हैं
वेल्दी डॉट इन के को-फाउंडर प्रशांत गुप्ता ने कहा, "अगर किसी इनवेस्टर ने हाई प्राइस पर सिल्वर खरीदा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसे अपना पैसा निकाल लेना चाहिए। इसी तरह गिरावट के बाद सिल्वर में निवेश बढ़ाने का भी कोई मतलब नहीं है।" जिन लोगों ने सिल्वर में थोड़ा इनवेस्ट किया है और लंबे समय के लिए निवेश किया है, वे अपना निवेश बनाए रख सकते हैं। जिन लोगों ने जल्द प्रॉफिट कमाने के मकसद से चांदी में ज्यादा निवेश किया है, वे अपने इनवेस्टमेंट पर पुनर्विचार कर सकते हैं।
इनवेस्टमेंट पोर्टफोलियो में सोने-चांदी की सीमित हिस्सेदारी
गुप्ता का मानना है कि इनवेस्टर के पोर्टफोलियो में सोने और चांदी की कुछ हिस्सेदारी होनी चाहिए। सोने की ज्यादा और चांदी की हिस्सेदारी कम होनी चाहिए। इसकी वजह यह है कि चांदी की कीमतों में उतार-चढ़ाव ज्यादा होता है। उन्होंने एक उदाहरण की मदद से इसे समझाया। अगर आपका इनवेस्टमेंट पोर्टफोलियो 10 लाख रुपये का है और आपने 2.5 लाख चांदी में निवेश किया है तो 10 फीसदी गिरावट पर आपके पोर्टफोलियो की वैल्यू 25,000 रुपये घट जाएगी। यह तब है जब पोर्टफोलियो के दूसरे एसेट्स की वैल्यू नहीं बदलेगी।
गुप्ता का कहना है कि अगर किसी इनवेस्टर के पोर्टफोलियो में सिल्वर नहीं है तो वह धीर-धीरे चांदी में निवेश कर सकता है। इससे उसकी खरीद अलग-अलग कीमत पर होगी, जिससे औसत खरीद मूल्य कम रहेगी। हालांकि, आनंदराठी वेल्थ के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर आदिल चाको की सोच इससे अलग है। उनका कहना है कि लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन के लिए चांदी में निवेश जरूरी नहीं है। उनका कहना है कि चांदी में ऐतिहासिक रूप से सालाना करीब 30-32 फीसदी का उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। यह निफ्टी 50 के 17-18 फीसदी के मुकाबले ज्यादा है।
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