प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने वाले लोग EPF के दायरे में आते हैं। हर महीने आपकी सैलरी का 12 फीसदी ईपीएफ में जमा होता है। आपकी कंपनी भी उतनी ही रकम आपके ईपीएफ अकाउंट में जमा करती है। कंपनी को एंप्लॉयी के एनपीएस अकाउंट में भी कंट्रिब्यूट करने की इजाजत है। यह स्वैच्छिक है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अगर एक फाइनेंशियल ईयर में आपके EPF और NPS अकाउंट में कंपनी का कंट्रिब्यूशन तय सीमा से ज्यादा हो जाता है तो अतिरिक्त अमाउंट पर एंप्लॉयी को टैक्स देना होगा।
2020 में पेश बजट में इसके लिए संसोधन किया गया था। इसके मुताबिक, अगर किसी एक फाइनेंशियल ईयर में एंप्लॉयी के EPF, NPS और रिटायरमेंट फंड में कंपनी (एंप्लॉयर) का कंट्रिब्यूशन 7.5 लाख रुपये से ज्यादा हो जाता है तो अतिरिक्त कंट्रिब्यूशन पर एंप्लॉयी को टैक्स देना होगा। इतना ही नहीं अतिरिक्त कंट्रिब्यूशन पर मिला इंटरेस्ट, डिविडेंड आदि पर भी एंप्लॉयी को टैक्स चुकाना होगा। इनकम टैक्स का यह नियम 1 अप्रैल, 2020 से लागू हो गया है।
आप अपने अप्वाइंटमेंट लेटर या एप्रेजल लेटर से यह जान सकते हैं कि आपके ईपीएफ और एनपीएस अकाउंट में आपकी कंपनी (Employer) कितना कंट्रिब्यूट करती है। पिछले कुछ महीनों में कंपनियों ने एप्रेजल प्रोसेस पूरा हुआ है। इसके बाद एंप्लॉयीज को एप्रेजल लेटर मिले हैं। ऐसे में आपको इस लेटर को ठीक तरह से समझ लेना जरूरी है। जिन लोगों ने नौकरी बदली है उन्हें भी नए अप्वाइंटमेंट लेटर को समझ लेना चाहिए।
आपके लिए यह समझ लेना जरूरी है कि ईपीएफ में आपकी कंपनी का कंट्रिब्यूशन दो हिस्सों में बंटा होता है। कंपनी (Employer) के 12 फीसदी का सिर्फ 3.67 फीसदी ही ईपीएफ अकाउंट में जमा होता है। बाकी 8.33 फीसदी हिस्सा एंप्लॉयीज पेंशन स्कीम (EPS) में जमा होता है। यह जान लेना भी जरूरी है कि ईपीएस कंट्रिब्यूशन के कैलकुलेशन के लिए 15,000 रुपये की सीमा तय है। इसका मतलब है कि कंपनी एंप्लॉयी के EPS अकाउंट में मैक्सिमम 1250 रुपये कंट्रिब्यूट कर सकती है। बाकी अमाउंट ईपीएफ अकाउंट में जमा होता है।
अब सवाल यह है कि क्या ईपीएफ के टैक्सेबल हिस्से को कैलकुलेट करने के लिए ईपीएस में होने वाले कंट्रिब्यूशन को ध्यान में रखा जाएगा? इस बारे में एक्सपर्ट्स का कहना है कि इनकम टैक्स कानून ईपीएफ और ईपीएस में फर्क नहीं करता है। इसलिए कंपनी की तरफ से होने वाले पूरे ईपीएफ कंट्रिब्यूशन को आपको चेक कर आपको यह तय करना होगा कि एंप्लॉयर का कंट्रिब्यूशन तय सीमा से ज्यादा है या नहीं।
एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि ईपीएफ में एंप्लॉयर का कंट्रिब्यूशन एंप्लॉयी के लिए टैक्सेबल नहीं होगा अगर यह सैलरी (बेसिक + डीए) के 12 फीसदी तक रहता है। अगर एंप्लॉयर का कंट्रिब्यूशन इस सीमा को पार कर जाता है तभी यह टैक्स के दायरे में आएगा। यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि एंप्लॉयी ईपीएफ में होने वाले अपने हिस्से के कंट्रिब्यूशन पर सेक्शन 80सी के तहत टैक्स बेनिफिट का दावा कर सकता है। दावा अधिकतम 1.5 लाख रुपये के लिए किया जा सकता है।
अगर एंप्लॉयर (कंपनी) एप्लॉयी के एनपीएस अकाउंट में कंट्रिब्यूट करती है तो एंप्लॉयी इनकम टैक्स कानून के तहत टैक्स डिडक्शन का दावा कर सकता है। यह डिडक्शन सेक्शन 80सीसीडी(2) के तहत किया जाएगा। यह सैलरी (बेसिक + डीए) का 10 फीसदी होगा। यह डिडक्शन 80सी के तहत किए जाने वाले 1.5 लाख रुपये तक और 80सीसीडी(1बी) के तहत 50,000 रुपये के डिडक्शन के अतिरिक्त होगा। हालांकि, सेक्शन 80सीसीडी (1) के तहत एंप्लॉयी के कंट्रिब्यूशन को सेक्शन 80सी के साथ क्लब कर दिया गया है। इस वजह से एनपीएस सहित सेक्शन 80सी के तहत एंप्लॉयी का कुल डिडक्शन एक फाइनेंशियल ईयर में 1.5 लाख रुपये से ज्यादा नहीं हो सकता।