Type 1 Diabetes का सामना करना और उपचार होगा आसान, अगर जान लेंगे ICMR की नई गाइडलाइन, 10 प्वाइंट्स

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने टाइप 1 डायबिटीज पर संशोधित दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं। इस रिसर्च डॉक्यूमेंट से यहां 10 प्वाइंट्स दिए जा रहे हैं...

अपडेटेड Jun 07, 2022 पर 12:12 PM
डायबिटीज (Diabetes) एक जीवन भर बनी रहने वाली बीमारी है। यह एक ऐसी स्थिति है, जब बॉडी में पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन बनना बंद हो जाता है या उपस्थित इंसुलिन का उपयोग नहीं हो पाता है

Type 1 Diabetes : डायबिटीज (Diabetes) एक जीवन भर बनी रहने वाली बीमारी है। यह एक ऐसी स्थिति है, जब बॉडी में पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन बनना बंद हो जाता है या उपस्थित इंसुलिन का उपयोग नहीं हो पाता है। इससे खून में ग्लूकोज के रुप में पाए जाने वाली शुगर की मात्रा बढ़ जाती है। डायबिटीज तीन प्रकार की होती हैं, टाइप 1 डायबिटीज इन्हीं में से एक है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने टाइप 1 डायबिटीज पर संशोधित दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं। इस रिसर्च डॉक्यूमेंट से यहां 10 प्वाइंट्स दिए जा रहे हैं...

अच्छी खुराक

Healthy diet : टाइप 1 डायबिटीज में आईसीएमआर ने अच्छी खुराक के सेवन का सुझाव दिया है। रोजाना की कुल कैलोरी में कॉर्बोहाइड्रेट 50-55 फीसदी, फैट्स 30 फीसदी, प्रोटीन 15-20 फीसदी होने चाहिए। एक से तीन साल के बच्चे के लिए नमक का सेवन 2.5 ग्राम प्रति दिन, चार से आठ साल तक के बच्चे के लए 3 ग्राम, 9 साल से ऊपर के बच्चे और किशोरों के लिए 3.8 ग्राम और वयस्कों के लिए 6 ग्राम प्रति दिन होना चाहिए। प्रोसेस्ड फूड में नमक ज्यादा होता है, इसलिए इन्हें कम खाना चाहिए।


व्यायाम

नियमित व्यायाम से स्वास्थ्य बेहतर होता है, मोटापे में कमी आती है और कार्डियोवस्कुलर रिस्क कम होता है। व्यायाम के तुरंत बाद इंसुलिन की जरूरत बढ़ जाती है। एरोबिक फिटनेस से ग्लाइसेमिक नियंत्रित किया जा सकता है। ज्यादा फिजिकल एक्टिविटी से कई बार इंसुलिन की जरूरत में बदलाव आ सकता है।

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इंसुलिन उपचार के साइड इफेक्ट

इंसुलिन थेरेपी के सबसे ज्यादा आम साइड इफेक्ट्स में से एक हाइपोग्लिसेमिया (Hypoglycemia) है। ग्लाइसेमिक कंट्रोल में सुधार से वजन बढ़ सकता है। एक ही जगह पर इंसुलिन इंजेक्शन लगाने से लिपोहाइपरट्रॉफी हो सकती है। एक नकारात्मक प्रभाव इंसुलिन की जगह पर इंफेक्शन हो सकता है।

ब्लड ग्लूकोज की निगरानी

Type 1 Diabetes में, ग्लाइसेमिक कंट्रोल के लिए ब्लड ग्लूकोज की निगरानी बेहद जरूरी है। छोटे बच्चों विशेष जिनका ग्लाइसेमिक कंट्रोल खराब होता है, उनके लिए दिन में चार से छह बार ब्लड ग्लूकोज की मॉनिटरिंग करनी पड़ सकती है। बेहतर ग्लाइसेमिक कंट्रोल की स्थिति में युवाओं में प्रति दिन दो से तीन बार मॉनिटरिंग करनी पड़ सकती है।

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Diabetic ketoacidosis

डायबिटिक कीटोएसोडोसिस होने जी मिचलाना और उल्टी, पेट दर्द, सांस में विशेष गंध आना और पानी की कमी जैसे संकेत मिलते हैं। काम के समय अक्सर रोगी नींद में रहता है। बेहतर उपचार, पर्याप्त जानकारी और प्रभावी संवाद से इससे बचने में मदद मिल सकती है।

विजन लॉस यानी नजर कमजोर होना

वयस्कों में डायबिटिक रेटिनोपैथी अंधेपन की एक मुख्य वजह है। अगर इस बीमारी का उपचार नहीं हो तो नजर खासी कमजोर हो सकती है। type 1 diabetes के मरीज को मोतियाबिंद, ग्लूकोमा आदि बीमारियां होने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।

किडनी की बीमारी

Diabetic nephropathy (DKD) भारत और दुनिया में लंबी किडनी की बीमारी की मुख्य वजह है। हाल के दशकों में, जल्दी जांच के साथ प्रभावी ग्लूकोज नियंत्रण और ब्लड प्रेशर मैनेजमेंट से इन मरीजों की स्थिति में सुधार देखने को मिला है।

न्यूरोपैथी (Neuropathy)

type 1 diabetes के मरीजों में न्यूरोपैथी माइक्रोवस्कुलर से जुड़ी सामान्य बीमारी है। इससे कई बीमारियों हो सकती हैं और मृत्यु के मामले भी ज्यादा होते हैं। फुट अल्सर की यह एक बड़ी वजह है। हालांकि, जानकारियों की कमी के चलते समस्या बढ़ जाती है।

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जान जाने का खतरा

गैर डायबिटिक लोगों की तुलना में, type 1 diabetes के मरीजों को दूसरी बीमारियां होने और जान जाने का खतरा ज्यादा होता है। आम लोगों की तुलना में इसके मरीजों को ज्यादा पहले कार्डियोवस्कुलर से जुड़ी बीमारियां होती हैं।

भारत में ज्यादा बच्चे प्रभावित

भारत में बड़ी संख्या में बच्चे अब type 1 diabetes की चपेट में आ रहे हैं। इससे ज्यादा जागरूकता के प्रसार की जरूरत महसूस होती है, जिससे इस बीमारी का बेहतर उपचार हो सकेग। जल्दी पता लगने और उपचार से बच्चों का लंबे समय तक जीवित रहना संभव है।

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