पेरेंट्स की वसीयत रजिस्टर्ड नहीं! अब भाई-बहनों के बीच संपत्ति का कैसे होगा बंटवारा, जानिए क्या कहता है कानून
अगर पेरेंट्स की वसीयत रजिस्टर्ड नहीं है तो संपत्ति का बंटवारा कैसे होता है? क्या बेटियों का हक खत्म हो जाता है? निजी और पैतृक संपत्ति में फर्क क्या है? जानिए कानून क्या कहता है और कोर्ट ऐसे विवादों में किस आधार पर फैसला करती है।
हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के बाद बेटियों को भी बेटों के बराबर अधिकार मिलते हैं।
भारत में बहुत से परिवारों में संपत्ति को लेकर सबसे बड़ा विवाद वसीयत को लेकर होता है। खासतौर पर तब, जब वसीयत रजिस्टर्ड न हो और वारिसों में बेटियां भी हों। अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या बिना रजिस्टर्ड वसीयत कानूनी होती है और ऐसे में संपत्ति का बंटवारा कैसे होगा।
ऐसा ही एक मामला है, जिसमें पिता के निधन के बाद बेटियों और बेटों के बीच संपत्ति को लेकर विवाद कोर्ट तक पहुंच गया। इस मामले में पाठक ने मनीकंट्रोल से सवाल पूछकर राय मांगी है।
आखिर क्या है पूरा मामला?
इस मामले में पाठक के पिता का निधन 2022 में हुआ। उनके पिता के पीछे छह बेटियां और पांच बेटे हैं। पिता ने अपने जीवनकाल में एक वसीयत बनाई थी, लेकिन उसे रजिस्टर्ड नहीं कराया।
संपत्ति का बंटवारा नहीं हुआ और 2024 में बेटियों ने कोर्ट में केस दायर कर दिया। बेटियों ने हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के तहत संपत्ति में बराबर हिस्से की मांग की। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संपत्ति पिता ने अपनी कमाई से खरीदी थी, न कि पैतृक तौर पर मिली थी।
क्या यह संपत्ति पैतृक मानी जाएगी?
मनीकंट्रोल ने यह सवाल टैक्स एक्सपर्ट बलवंत जैन से पूछा। उन्होंने बताया कि कानून के मुताबिक, 1956 के बाद खरीदी गई संपत्ति तो वह पैतृक नहीं मानी जाती। अगर किसी व्यक्ति ने उसे अपनी कमाई से ली है तो।
ऐसी संपत्ति हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की निजी संपत्ति होती है। इस मामले में भी पिता की संपत्ति निजी मानी जाएगी।
बिना रजिस्टर्ड वसीयत कितनी वैध है?
बलवंत जैन का कहना है कि यह सबसे बड़ा और अहम सवाल है। भारतीय कानून साफ कहता है कि वसीयत का रजिस्टर्ड होना जरूरी नहीं है। अगर वसीयत सही तरीके से बनाई गई है, उसमें गवाह हैं और यह साबित हो सके कि इसे बिना किसी दबाव या धोखाधड़ी के बनाया गया है, तो वह पूरी तरह वैध मानी जाती है।
इसलिए सिर्फ इस आधार पर वसीयत को खारिज नहीं किया जा सकता कि वह रजिस्टर्ड नहीं है।
बेटियों के अधिकार क्या होंगे?
हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के बाद बेटियों को भी बेटों के बराबर अधिकार मिलते हैं। अगर पिता की वसीयत में बेटियों को हिस्सा दिया गया है, तो वे उसी हिस्से की हकदार होंगी। वसीयत मौजूद होने के बावजूद बेटियों को कानूनन नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अगर वसीयत न होती तो क्या होता?
बलवंत जैन के मुताबिक, अगर पिता का बिना वसीयत के निधन हो जाता, तो इसे Intestate Death कहा जाता। ऐसी स्थिति में सभी बेटे, सभी बेटियों, मां (अगर जीवित हों), दादी (अगर जीवित हों) को संपत्ति में बराबर हिस्सा मिलता।
आंशिक वसीयत की स्थिति में क्या नियम है?
कई बार वसीयत में सिर्फ कुछ संपत्तियों का जिक्र होता है। ऐसे मामलों में जिन संपत्तियों का जिक्र वसीयत में है, उनका बंटवारा वसीयत के अनुसार होगा जिन संपत्तियों का जिक्र नहीं है, वे सभी कानूनी वारिसों में बराबर बांटी जाएंगी। इस पूरे मामले से कुछ बातें बिल्कुल साफ हो जाती हैं।
बिना रजिस्टर्ड वसीयत भी पूरी तरह वैध होती है।
बेटियों को भी बेटों के बराबर कानूनी अधिकार है।
वसीयत होने पर संपत्ति उसी के अनुसार बांटी जाती है।
वसीयत में शामिल न की गई संपत्ति सभी वारिसों में बराबर बंटती है।
ऐसे में सही समय पर वसीयत बनाना और उसे साफ-साफ लिखना परिवार को लंबे कानूनी झगड़ों से बचा सकता है। अगर परिवार में कई वारिस हैं, तो यह और भी जरूरी हो जाता है।
Disclaimer:मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।