सब्जी बेचने वाले के खाते से करोड़ों का लेनदेन, टैक्स विभाग की पड़ी नजर; जानिए पूरा मामला

सब्जी बेचने वाले के खाते में करोड़ों का लेनदेन देख टैक्स विभाग चौंक गया। ITR न भरने पर 3.53 करोड़ को आय मान लिया गया। जानिए कैसे एक छोटे व्यापारी का केस बना बड़ा कानूनी मामला।

अपडेटेड Apr 06, 2026 पर 4:49 PM
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सब्जी व्यापारी के बैंक खाते में भारी कैश लेनदेन देखकर टैक्स विभाग ने केस उठाया। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

कर्नाटक के कोलार के एक छोटे सब्जी व्यापारी का केस बड़ा कानूनी मामला बन गया। यह सब्जी का व्यापारी APMC यार्ड में काम करता था। APMC यार्ड वो सरकारी मंडी होती है, जहां किसान अपनी फसल बेचने आते हैं और व्यापारी वहीं से खरीदते हैं। जैसे कि सब्जी, अनाज, फल। सब्जी व्यापारी ने उस साल का आयकर रिटर्न दाखिल नहीं किया था और कहा था कि उसे नुकसान हुआ है।

टैक्स विभाग ने क्यों उठाया मामला

सब्जी व्यापारी के बैंक खाते में भारी कैश लेनदेन देखकर टैक्स विभाग ने केस उठाया। खाते में करीब 44.64 लाख रुपये जमा हुए थे और लगभग 2.96 करोड़ रुपये निकाले गए थे।


टैक्सपेयर ने कई बार नोटिस मिलने के बावजूद कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद असेसिंग ऑफिसर ने एकतरफा फैसला लेते हुए पूरे 3.53 करोड़ रुपये को आयकर कानून की धारा 69A के तहत अघोषित आय मान लिया। पहली अपील में भी यही फैसला बरकरार रखा गया, क्योंकि टैक्सपेयर लगातार जवाब नहीं दे रहा था।

टैक्सपेयर ने जवाब क्यों नहीं दिया

इस केस को खास बनाता है उस व्यक्ति की स्थिति। ट्रिब्यूनल के मुताबिक, वह किसान और छोटा व्यापारी था, जो दूरदराज इलाके से आता है और सिर्फ 9वीं तक पढ़ा है।

उसे ईमेल पर आने वाले टैक्स नोटिस और ऑनलाइन प्रक्रिया की जानकारी नहीं थी। इसी वजह से विभाग की तरफ से भेजी गई सूचनाएं उस तक सही तरीके से पहुंच ही नहीं पाईं।

यही कारण रहा कि मामला 'बेस्ट जजमेंट असेसमेंट' तक पहुंच गया, जो आज के फेसलेस टैक्स सिस्टम में अक्सर देखने को मिलता है।

ITAT ने मामले पर क्या कहा

जब मामला ITAT (Income Tax Appellate Tribunal) पहुंचा, तो बेंच ने गौर किया कि असेसिंग ऑफिसर ने जमा और निकासी दोनों को ही अघोषित आय मान लिया, बिना यह देखे कि असल में पैसा कैसे घूम रहा था।

ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि एक ही पैसे को दो बार टैक्स नहीं लगाया जा सकता। अगर जमा और निकासी एक ही फंड का हिस्सा हैं, तो दोनों को अलग-अलग आय नहीं माना जा सकता। बेंच ने यह भी माना कि टैक्सपेयर ने जवाब नहीं दिया, लेकिन इसके बावजूद टैक्स जोड़ ठोस आधार पर होना चाहिए, सिर्फ गणित के हिसाब से नहीं।

निचली अथॉरिटी का फैसला रद्द

ट्रिब्यूनल ने निचली अथॉरिटी के फैसले को रद्द कर दिया और मामला फिर से असेसिंग ऑफिसर के पास भेज दिया। साथ ही टैक्सपेयर को कहा गया कि वह सहयोग करे और कैश डिपॉजिट का सही सोर्स बताए। इस तरह उसे अपना पक्ष रखने का एक और मौका मिला।

ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि कैश वाले कारोबार में बैंक में जमा और निकासी अक्सर घूमती हुई पूंजी होती है, अलग-अलग आय नहीं।

टैक्सपेयर और विभाग के लिए सबक

यह फैसला दिखाता है कि डिजिटल टैक्स सिस्टम और जमीनी हकीकत में अभी भी अंतर है। छोटे शहरों और गांवों के कई लोग ऑनलाइन नोटिस और प्रक्रियाओं को समझ नहीं पाते। ट्रिब्यूनल ने माना कि नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन सिर्फ प्रक्रिया की कमी के कारण किसी असली केस को नुकसान नहीं होना चाहिए।

साथ ही यह भी साफ किया कि नोटिस को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। इससे बड़ा टैक्स बोझ और लंबी कानूनी लड़ाई झेलनी पड़ सकती है।

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