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अनाथ से आइकन तक! ये कहानी है जमशेदजी जीजाभाई, जिन्हें अंग्रेजों ने दी नाइट की उपाधि

19वीं सदी का भारत गरीबी, भेदभाव और सामाजिक चुनौतियों से घिरा हुआ था। ऐसे दौर में किसी आम इंसान का देशभर में नाम कमाना सपना ही लगता था। लेकिन एक अनाथ पारसी बालक ने न सिर्फ अपने जीवन को संवारा, बल्कि समाज को दिशा देने वाला भी बना

MoneyControl Newsअपडेटेड Jul 17, 2025 पर 4:52 PM
अनाथ से आइकन तक! ये कहानी है जमशेदजी जीजाभाई, जिन्हें अंग्रेजों ने दी नाइट की उपाधि
जमशेदजी जीजाभाई ने अपने मजबूत इरादों, व्यापारिक समझ और समाजसेवा की भावना से इतिहास रच दिया।

19वीं सदी का भारत गरीबी, भेदभाव और सामाजिक चुनौतियों से घिरा हुआ था। ऐसे दौर में किसी आम इंसान का देशभर में नाम कमाना सपना ही लगता था। लेकिन एक अनाथ पारसी बालक ने न सिर्फ अपने जीवन को संवारा, बल्कि समाज को दिशा देने वाला भी बना। ये थे जमशेदजी जीजाभाई। जमशेदजी जीजाभाई ने अपने मजबूत इरादों, व्यापारिक समझ और समाजसेवा की भावना से इतिहास रच दिया। उन्हें 1842 में अंग्रेजों ने नाइट तक की उपाधि दे दी।

शुरुआती जीवन और संघर्ष

15 जुलाई 1783 को मुंबई तब बॉम्बे में एक साधारण पारसी परिवार में जन्मे जमशेदजी ने बचपन में ही अपने माता-पिता को खो दिया। उनकी परवरिश उनके मामा ने की। आर्थिक तंगी और औपचारिक शिक्षा की कमी के बावजूद उन्होंने मेहनत और सूझबूझ से अपना जीवन संवारा।

सिर्फ 15 साल की उम्र में वे अपने मामा के साथ अफीम और कपास के कारोबार में शामिल हुए। अनुभव बढ़ने पर उन्होंने खुद की कंपनी शुरू की और चीन जैसे देशों तक कारोबार फैलाया। कुछ ही सालों में वे बॉम्बे के सबसे जाने-माने व्यापारियों में गिने जाने लगे।

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