पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और सीमित एयर कॉरिडोर के कारण एविएशन सेक्टर पर दबाव बढ़ गया है। इससे एयरलाइंस की लागत तेजी से बढ़ रही है और गर्मियों के पीक ट्रैवल सीजन से पहले हवाई किराए भी महंगे होने लगे हैं।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और सीमित एयर कॉरिडोर के कारण एविएशन सेक्टर पर दबाव बढ़ गया है। इससे एयरलाइंस की लागत तेजी से बढ़ रही है और गर्मियों के पीक ट्रैवल सीजन से पहले हवाई किराए भी महंगे होने लगे हैं।
महंगे तेल से बढ़ी एयरलाइंस की लागत
एयरलाइंस के सामने सबसे बड़ी चुनौती कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी है। इसका सीधा असर एविएशन टरबाइन फ्यूल यानी ATF पर पड़ता है, जो एयरलाइंस के खर्च का बड़ा हिस्सा होता है।
एविएशन एक्सपर्ट और बेंगलुरु एयरपोर्ट के पूर्व चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर सत्यकि रघुनाथ के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत पहले लगभग 70-72 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा हो गई है। यानी कम समय में करीब 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
उन्होंने बताया कि ATF आम तौर पर एयरलाइंस के कुल ऑपरेटिंग खर्च का 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा होता है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव के कारण सप्लाई पर असर पड़ा है, इसलिए एयरलाइंस अब इसका असर यात्रियों पर डाल रही हैं।
एयरलाइंस ने बढ़ाया फ्यूल सरचार्ज
कई एयरलाइंस ने किरायों में बदलाव शुरू कर दिया है। IndiGo ने 14 मार्च से फ्यूल चार्ज लागू किया है। कंपनी के मुताबिक IATA के Jet Fuel Monitor के आंकड़े बताते हैं कि इस क्षेत्र में फ्यूल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है, इसलिए किराए में आंशिक बदलाव किया गया है।
Air India ने भी अपने नेटवर्क पर चरणबद्ध तरीके से फ्यूल सरचार्ज लागू करने की घोषणा की है। यह सरचार्ज घरेलू और SAARC रूट्स पर 399 रुपये से शुरू होता है। वहीं वेस्ट एशिया रूट्स पर 10 डॉलर और लंबी दूरी की उड़ानों जैसे उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के लिए यह 200 डॉलर तक जा सकता है।
टाटा ग्रुप की इस विमानन कंपनी का कहना है कि फ्यूल की लागत बढ़ने के कारण यह बढ़ोतरी जरूरी थी। अगर ऐसा नहीं किया जाता तो कुछ रूट्स पर उड़ान चलाना मुश्किल हो सकता था।
नई घरेलू एयरलाइन Akasa Air ने भी 199 रुपये से 1,300 रुपये तक का फ्यूल सरचार्ज लागू किया है। कंपनी के मुताबिक, ATF की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के कारण यह फैसला लिया गया है और जरूरत के हिसाब से आगे इसकी समीक्षा भी की जाएगी।
एयरस्पेस प्रतिबंध से बढ़ा खर्च
एयरलाइंस को एयरस्पेस प्रतिबंधों के कारण भी परेशानी हो रही है। भारतीय एयरलाइंस पाकिस्तान के एयरस्पेस का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं और पश्चिम एशिया में भी कई सीमाएं लागू हैं। इसके कारण यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाली उड़ानों को लंबा रास्ता लेना पड़ रहा है।
सत्यकि रघुनाथ के मुताबिक, अब कई उड़ानों को पहले पश्चिम की ओर सऊदी अरब के रास्ते जाना पड़ता है। फिर वहां से यूरोप की ओर मुड़ना पड़ता है। इससे उड़ान का समय और ईंधन दोनों ज्यादा लगते हैं। उदाहरण के तौर पर मुंबई से लंदन जाने वाली उड़ान अब लंबे रूट की वजह से करीब 10.5 घंटे ले रही है।
कनेक्टिविटी पर भी असर
पश्चिम एशिया भारतीय यात्रियों के लिए यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने का बड़ा ट्रांजिट हब है। भारत से यूरोप, अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका जाने वाले लगभग 40 प्रतिशत यात्री दुबई, दोहा और अबू धाबी जैसे हब के जरिए यात्रा करते हैं। लेकिन क्षेत्र में व्यवधान के कारण कई एयरलाइंस ने अपनी क्षमता घटा दी है। इससे सीटों की कमी हो गई है और किराए तेजी से बढ़ने लगे हैं।
खासकर उन शहरों के लिए ज्यादा असर दिख रहा है जहां भारत से सीधी उड़ान नहीं है, जैसे मैड्रिड और बार्सिलोना। इन जगहों के लिए यात्रियों को खाड़ी देशों के ट्रांजिट हब पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ता है।
गर्मियों के सीजन पर पड़ेगी मार
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर ईरान युद्ध गर्मियों तक जारी रहता है तो इसका असर और ज्यादा दिख सकता है। एक एविएशन एक्सपर्ट के मुताबिक, अगर पश्चिम एशिया के हब से ट्रैफिक कम हुआ तो यूरोपीय एयरलाइंस भी कई रूट्स पर किराए बढ़ा सकती हैं।
ऐसी स्थिति में यात्रियों का रुख सिंगापुर, हांगकांग या फ्रैंकफर्ट जैसे दूसरे ट्रांजिट हब की ओर जा सकता है। वहीं कोलंबो और थाईलैंड जैसे डेस्टिनेशन पर भी मांग बढ़ सकती है।
भारतीय एयरलाइंस को सीमित फायदा
किराए बढ़ने के बावजूद भारतीय एयरलाइंस को ज्यादा फायदा होने की संभावना कम है। इसकी वजह यह है कि भारत की बहुत कम एयरलाइंस के पास लंबी दूरी की उड़ानों के लिए बड़े विमान हैं।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक अगर पश्चिम एशिया में दिक्कत लंबे समय तक जारी रही तो भारतीय एयरलाइंस को भी नुकसान हो सकता है। क्योंकि यह उनके लिए सबसे लाभदायक बाजारों में से एक है।
एविएशन मार्केट का भविष्य कैसा होगा
विमानन सेक्टर का भविष्य काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों और यात्रा की मांग पर निर्भर करेगा। अगर फ्यूल महंगा बना रहता है और किराए लगातार बढ़ते हैं तो यात्रियों की मांग कम हो सकती है।
फिलहाल पूरा सेक्टर अनिश्चितता के दौर में है। अगर क्षेत्र में तनाव जल्दी कम होता है तो असर सीमित रह सकता है। लेकिन अगर संकट गर्मियों तक जारी रहा तो एयरलाइंस और यात्रियों दोनों को लंबे समय तक महंगे किराए और यात्रा में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।
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