गुजरात हाई कोर्ट ने 27 नवंबर 2025 को एक अहम फैसले में यह माना कि पत्नी का कठोर धार्मिक व्यवहार और घर के खाने को लेकर लगातार टकराव पति के लिए मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट में दिए गए तलाक के आदेश को बरकरार रखते हुए पति के पक्ष में फैसला सुनाया। यह मामला खास तौर पर इसलिए चर्चा में रहा क्योंकि विवाद की एक बड़ी वजह पत्नी का प्याज-लहसुन न खाने का कठोर नियम और उसी को लेकर परिवार में लगातार तनाव बताया गया।
इस मामले में पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। उसका कहना था कि पत्नी के व्यवहार, धार्मिक कट्टरता और जिद के कारण शादीशुदा जीवन पूरी तरह तनावपूर्ण हो गया था। पत्नी का अलग खाना, बार-बार झगड़े और लगातार शिकायतें रिश्ते में ऐसी दरार बन गईं, जिसे भरना संभव नहीं रहा। फैमिली कोर्ट ने इन तथ्यों को मानते हुए तलाक की मंजूरी दे दी।
पत्नी ने हाई कोर्ट में तलाक को चुनौती नहीं दी, लेकिन स्थायी गुजारा भत्ता (एलिमनी) अमाउंट को लेकर आपत्ति जताई। उसका कहना था कि पति की इनकम ज्यादा है और उसे भरण-पोषण नहीं दिया गया। पत्नी ने दावा किया कि पति फैक्ट्री का मालिक है और 60 से 70 हजार रुपये महीने कमाता है, जबकि पति ने इसे गलत बताते हुए खुद को एक प्राइवेट कंपनी में कम सैलरी पर काम करने वाला बताया।
गुजरात हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि फैमिली कोर्ट ने सभी सबूतों और डॉक्यूमेंट को सही तरीके से परखा है। कोर्ट ने पाया कि पति की इनकम से जुड़े जो प्रमाण पेश किए गए, वे उसके सीमित संसाधनों की ओर इशारा करते हैं। इसके अलावा यह भी रिकॉर्ड पर आया कि पत्नी खुद भी काम करती थी, जिसकी जानकारी उसने छिपाने की कोशिश की। ऐसे में कोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट तय किया गया गुजारा भत्ता न तो मनमाना है और न ही अवैध।
एलिमनी के मुद्दे पर हाई कोर्ट ने साफ किया कि पति की जिम्मेदारी उसके माता-पिता और बेटे की भी है। पति एक छोटे से मकान में रहता है और उसकी आमदनी सीमित है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए फैमिली कोर्ट ने 2013 से 2020 तक 8,000 रुपये मंथली और उसके बाद 10,000 रुपये मंथली भरण-पोषण तय किया था, जिसे हाई कोर्ट ने उचित ठहराया।
अंत में कोर्ट ने बकाया रकम के पेमेंट को लेकर भी दिशा-निर्देश दिए। पति के पहले से जमा की गई अमाउंट को समायोजित करते हुए शेष रकम पत्नी के खाते में ट्रांसफर करने का आदेश दिया गया। इसके साथ ही पत्नी की अपील खारिज कर दी गई और तलाक व भरण-पोषण से जुड़ा फैमिली कोर्ट का आदेश कायम रखा गया।