'जंग या भू-राजनीतिक तनाव नहीं...', वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने बताया किस वजह से घटते-बढ़ते हैं सोने के भाव

क्या सच में युद्ध नहीं, बल्कि कुछ और तय करता है सोने का भाव? वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के CEO ने खुलासा किया है कि असली खेल जंग से अलग है, जो आने वाले समय में गोल्ड को नई ऊंचाई पर ले जा सकता है। जानिए डिटेल।

अपडेटेड Apr 09, 2026 पर 10:59 PM
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के बावजूद मार्च में सोना करीब 13% गिर गया और चांदी में 23% की गिरावट आई।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के CEO डेविड टेट (David Tait) का कहना है कि सोने की कीमतों को असल में युद्ध या जियोपॉलिटिकल तनाव नहीं, बल्कि दुनिया पर बढ़ता कर्ज तय करता है। उनके मुताबिक हाल के बाजार के उतार-चढ़ाव ने फिर साबित किया है कि सोना लंबे समय में अपने मजबूत फंडामेंटल्स पर ही चलता है।

CNBC-TV18 से बातचीत में टेट ने साफ कहा कि वेस्ट एशिया के तनाव के दौरान सोने में आई गिरावट को उसके सेफ-हेवन रोल की कमजोरी नहीं समझना चाहिए। उनका कहना है कि सोना ज्यादा प्रतिक्रिया अर्थव्यवस्था की बुनियादी हालत पर देता है, न कि युद्ध या टैरिफ जैसे छोटे समय के असर पर।

तनाव के बीच भी क्यों गिरा सोना


28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ईरान के साथ बड़ा तनाव पैदा हुआ, जिससे ग्लोबल एनर्जी मार्केट हिल गया। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने और इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान से तेल की कीमतों में भारी उछाल आया, कुछ मामलों में 120% तक।

इसके बावजूद मार्च में सोना करीब 13% गिर गया और चांदी में 23% की गिरावट आई। टेट के मुताबिक, यह सामान्य है क्योंकि संकट के समय निवेशक अपने सबसे ज्यादा मुनाफे वाले एसेट को बेचकर दूसरे नुकसान की भरपाई करते हैं।

कीमतों में गिरावट कितनी सामान्य

टेट ने बताया कि सोना अपने पीक 5,500-5,600 डॉलर प्रति औंस से गिरकर 4,700-4,800 डॉलर के दायरे में आया है, जो पहले भी देखे गए पैटर्न के हिसाब से सामान्य करेक्शन है।

उन्होंने कहा कि इतने बड़े तनाव के बावजूद सोना 5,000 डॉलर के आसपास बना हुआ है। यह दिखाता है कि बाजार अब युद्ध की असली लागत और उसके कर्ज पर असर को समझ रहा है।

असली ड्राइवर: बढ़ता ग्लोबल कर्ज

टेट के मुताबिक, सोने की कीमतों के पीछे सबसे बड़ा कारण बढ़ता वैश्विक कर्ज है। सरकारें ज्यादा खर्च कर रही हैं, ग्रोथ धीमी है और महंगाई बनी हुई है। इससे कर्ज का बोझ बढ़ रहा है।

उनका कहना है कि युद्ध खुद नहीं, बल्कि उससे बढ़ने वाला खर्च और कर्ज ही सोने को सपोर्ट करता है। यही फैक्टर उसकी कीमतों में इजाफा करता है।

करेंसी पर दबाव और सोने का फायदा

बढ़ते कर्ज से फिएट करेंसी पर दबाव पड़ता है, जिससे सोना और मजबूत होता है। टेट का मानना है कि आने वाले समय में सोना नई ऊंचाई छू सकता है।

टेट के मुताबिक, बार और सिक्कों में निवेश मजबूत बना रहेगा क्योंकि निवेशक इसे सुरक्षित विकल्प और पोर्टफोलियो संतुलन के तौर पर देखते हैं। भारत जैसे बाजारों में ज्वेलरी की मांग समय के साथ ऊंची कीमतों के हिसाब से खुद को ढाल लेगी। ETF निवेश में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।

निवेशकों के लिए अहम संकेत

टेट ने कहा कि निवेशकों को खबरों से ज्यादा मैक्रोइकोनॉमिक हालात पर ध्यान देना चाहिए। उनके मुताबिक, सोने में बड़ी गिरावट आमतौर पर फिस्कल पॉलिसी के बदलाव से आती है, न कि युद्ध या टैरिफ से।

टेट ने साफ कहा कि शॉर्ट टर्म में सोने की कीमतें ऊपर-नीचे हो सकती हैं, लेकिन लॉन्ग टर्म में इसकी दिशा दुनिया की आर्थिक हालत और कर्ज के स्तर से तय होगी।

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