Chhath Puja 2025: छठ महापर्व का हिंदु धर्म में बहुत महत्व है। ये लोक आस्थ का महापर्व है, जिसमें प्रकृति का आभार प्रकट करते हैं। कार्तिक मास हिंदू कैलेंडर का बेहद महत्वपूर्ण महीना है। इस महीने में दिवाली छठ और देवउठानी एकादशी का पर्व मनाया जाता है। अभी दिवाली का पांच दिवसीय पर्व चल रहा है और इसके समापन के दो दिन बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से छठ महापर्व की शुरुआत हो जाएगी। यह त्योहार कार्तिक मार्स के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, इसलिए इसे सूर्य षष्ठी या षष्ठी व्रत भी कहते हैं। इसमें सूर्य देव और छठी मैया की पूजा की जाती है।
छठ पर्व में सबसे पहले नहाय-खाय की परंपरा है। इसके बाद खरना और फिर शुरू होता है 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है। इस व्रत का समापन कार्तिक शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को उगते सूरज को प्रात: अर्घ्य देने के साथ होता है।
25 अक्टूबर (शनिवार) : नहाय-खाय
26 अक्टूबर (रविवार) : लोहंडा, खरना शाम में 5:35 से रात्रि 8:45 बजे तक
28 अक्टूबर (मंगलवार) : सूर्य को प्रातःकालीन अर्घ्य (प्रात: 5:33 बजे से सुबह 6:30 बजे तक)
परंपरा का अनुठा संगम है छठ
नहाय-खाय (25 अक्टूबर): कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को नहाय-खाय के साथ छठ शुरू होता है। इस दिन व्रती गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कर सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। नहाय-खाय में भाप में पका चावल, चने की दाल और लौकी की सब्जी खाने की परंपरा है। इस दिन से लहसुन, प्याज और मांसाहार बंद हो जाता है। घर में साफ-सफाई और पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
खरना (26 अक्टूबर): दूसरे दिन व्रती पूरे दिन व्रत रखते हैं और सूर्यास्त के बाद विशेष प्रसाद खाकर व्रत खोलते हैं। विशेष प्रसाद में गुड़ की खीर, घी लगी रोटी, केला और दूध से प्रसाद बनाते हैं। यह प्रसाद परिवार और आस-पड़ोस के लोगों में बांटा जाता है। इस साल 26 अक्टूबर को सूर्योदय: सुबह 6:29 बजे होगा, जबकि सूर्यास्त: शाम 5:41 बजे होगा।
संध्या अर्घ्य (27 अक्टूबर): संध्या अर्घ्य कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को किया जाता है। इस दिन व्रती निर्जला उपवास करते हैं। शाम को डूबते हुए सूरज यानी अस्ताचलगामी सूर्य को आभार प्रकट करते हुए संध्या अर्घ्य दिया जाता है। व्रती सूर्य देव की पूजा करते हैं और उनसे परिवार की सुख-शांति, अच्छी सेहत और तरक्की की कामना करते हैं।
प्रात: अर्घ्य (28 अक्टूबर): छठ महापर्व का आखिरी दिन होता है कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को। इस दिन व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन करते हैं। उषा अर्घ्य का अर्थ है भोर का अर्घ्य, जो नई शुरुआत और आशा का प्रतीक है। अर्घ्य देने के बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं और अपने व्रत को पूर्ण करते हैं। सप्तमी सूर्योदय अर्घ्य 28 अक्टूबर को सुबह 6:30 बजे दिया जाएगा।