पुरी, ओडिशा स्थित श्रीजगन्नाथ धाम एक बार फिर श्रद्धा और भक्ति के रंग में रंग चुका है। हर वर्ष की तरह इस बार भी भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को बड़े धूमधाम से निकाली जाएगी। ये यात्रा धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बेहद खास मानी जाती है। रथ यात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विशाल रथों पर विराजमान होकर श्रीमंदिर से निकलते हैं और गुंडिचा मंदिर तक की यात्रा करते हैं। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से पुरी पहुंचकर रथ खींचने और भगवान के दिव्य दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।
माना जाता है कि इस पवित्र यात्रा में भाग लेने मात्र से व्यक्ति के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि रथ यात्रा के दौरान पुरी का माहौल भक्तिमय उत्सव में बदल जाता है।
कब शुरू होती है रथ बनाने की प्रक्रिया?
इस भव्य यात्रा की तैयारी साल भर पहले शुरू हो जाती है। वसंत पंचमी के शुभ दिन पर रथ निर्माण के लिए लकड़ी की कटाई की जाती है और मकर संक्रांति के दिन से रथ बनाना शुरू हो जाता है। इन रथों को पारंपरिक विधि और खास किस्म की लकड़ियों से तैयार किया जाता है।
108 कलशों से होता है अभिषेक
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को मंदिर के बाहर लाया जाता है और उन्हें तीर्थ जल से स्नान कराया जाता है। इस स्नान को “स्नान यात्रा” या “स्नान पूर्णिमा” कहा जाता है। 108 कलशों में भरकर लाया गया जल चंदन, गुलाब जल, घी, दही और विभिन्न तीर्थों के जल के साथ मिलाकर देवताओं को स्नान कराया जाता है। सुभद्रा जी का स्नान विशेष विधि से किया जाता है और स्नान के बाद भगवानों को राजसी वस्त्र और आभूषणों से सजाया जाता है।
स्नान के बाद क्यों बीमार पड़ते हैं भगवान?
स्नान यात्रा के ठीक बाद भगवान जगन्नाथ 15 दिनों के लिए बीमार हो जाते हैं। इस समय को "अनासर काल" कहा जाता है। पुराणों के अनुसार, एक बार भगवान के परम भक्त माधव दास गंभीर रूप से बीमार हो गए थे। तब भगवान स्वयं उनकी सेवा करने आए और उनकी पीड़ा अपने ऊपर ले ली। उसी दिन से ये परंपरा चली आ रही है कि स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान 15 दिनों के लिए एकांत में रहते हैं।
क्या है अनासर पूजा की विशेषता?
जब भगवान बीमार होते हैं, तब मंदिर में उनकी मूर्तियों की बजाय चित्र रूप में पूजा की जाती है। इस काल में भगवान जगन्नाथ को विष्णु, बलभद्र को शिव और सुभद्रा को आदिशक्ति के रूप में पूजित किया जाता है। इस दौरान नियमित आरती, स्नान, दंतधौती, दीप सज्जा और वस्त्र पूजा होती है।
अनासर पंचमी और फुलुरी तेल की परंपरा
अनासर काल के दौरान आषाढ़ कृष्ण पंचमी को "अनासर पंचमी" मनाई जाती है। इस दिन भगवानों को 'फुलुरी तेल' लगाया जाता है, जो स्नान से हुए बुखार को शांत करता है। ये तेल विशेष जड़ी-बूटियों, फूलों, कपूर, चंदन और तिल के तेल से तैयार किया जाता है। इसे रथ यात्रा से पांच दिन पहले 'हेरा पंचमी' के दिन बनाकर जमीन के नीचे रखा जाता है।
नव जौबाना दर्शन और रथ यात्रा का आरंभ
जब भगवान जगन्नाथ स्वस्थ हो जाते हैं, तो "नव जौबाना दर्शन" होता है – यानी भगवान के युवा रूप का प्रथम दर्शन। अगले ही दिन से भव्य रथ यात्रा शुरू होती है, जिसमें श्रद्धालु भगवान का रथ खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।
ये रथ यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और परंपरा का ऐसा संगम है जो करोड़ों लोगों को ईश्वर से जोड़ता है।