Paush Putrada Ekadashi Vrat Today: पौष माह का हिंदू कैलेंडर में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। ये माह सूर्य देव की उपासना को समर्पित होता है और इसे छोटा पितृ पक्ष भी कहते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस माह में पितरों के लिए दान-तर्पण या श्राद्ध करने से पितृ प्रसन्न होते हैं और अपने वशंजों को आशीर्वाद देते हैं। ऐसा करने से पितृ दोष भी शांत होता है। इसी माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जाता है।
यह व्रत संतान प्राप्ति या संतान की उन्नति और खुशहाली के साथ-साथ सौभाग्य की कामना से भी किया जाता है। पुत्रदा एकादशी का व्रत साल में दो बार किया जाता है। पौष महीने से पहले ये व्रत सावन के महीने में भी किया जाता है। इसलिए ये व्रत साल की सभी 24 एकादशियों में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। आज पौष महीने की पुत्रदा एकादशी है। आइए जानें आज के दिन का मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा के बारे में।
पंचांग के अनुसार, पौष पुत्रदा एकादशी 30 दिसंबर 2025 को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 30 दिसंबर को सुबह 7:50 बजे शुरू होगी और 31 दिसंबर को सुबह 5:00 बजे समाप्त होगी। इस व्रत का पारण 31 दिसंबर को किया जाएगा। पौष पुत्रदा एकादशी व्रत के पारण का समय 31 दिसंबर को दोपहर 1:29 बजे से 3:33 बजे के बीच किया जाएगा।
पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा
एक नगर में सुकेतुमान नाम के राजा रहते थे। उनकी पत्नी का नाम शैव्या था। राजा के कोई संतान नहीं थी, इसलिए वे दोनों बहुत दुखी रहते थे। राजा को चिंता रहती थी कि उनके बाद राज्य कौन संभालेगा और उनके जाने के बाद उनका अंतिम संस्कार और मोक्ष कैसे होगा।
एक दिन राजा जंगल घूमने गए। वहां उन्होंने देखा कि पशु-पक्षी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ खुशी से रह रहे हैं। यह देखकर राजा और भी दुखी हो गए और सोचने लगे कि इतने अच्छे कर्म करने के बाद भी उन्हें संतान क्यों नहीं मिली।
कुछ समय बाद राजा को प्यास लगी। पानी की तलाश में वे नदी के किनारे बने ऋषियों के आश्रम पहुंचे। राजा ने सभी ऋषियों को प्रणाम किया। राजा की नम्रता से ऋषि बहुत प्रसन्न हुए और बोले कि वह कोई वर मांग सकते हैं। राजा ने कहा कि उनके पास सब कुछ है, लेकिन संतान नहीं है, इसी कारण वे दुखी हैं।
ऋषियों ने कहा कि भगवान की कृपा से ही राजा वहां आए हैं। उन्होंने राजा को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी। राजा ने पूरे नियम से व्रत किया। कुछ समय बाद रानी गर्भवती हुईं और उन्हें एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई। अंत में राजा को मोक्ष भी मिला। इस तरह पुत्रदा एकादशी व्रत का महत्व और भी बढ़ गया।