पोंगल एक पवित्र फसल त्योहार है, जिसे हर साल पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। ये त्योहार खास तौर पर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में मनाया जाता है, लेकिन अब देश के दूसरे हिस्सों में भी लोग इसे पूरे उत्साह के साथ मनाने लगे हैं। दक्षिण भारत में पोंगल को नए साल की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है। ये त्योहार नई फसल, प्रकृति और मेहनत के लिए धन्यवाद देने का प्रतीक होता है। इस दौरान लोग सूर्य देव की पूजा करते हैं, क्योंकि यह समय सूर्य के उत्तर दिशा में जाने की शुरुआत को दर्शाता है।
पोंगल चार दिनों तक मनाया जाने वाला पर्व है। तमिल भाषा में 'पोंगल' का मतलब होता है 'उबालना'। यह त्योहार नई फसल, प्रकृति और मेहनत के लिए आभार जताने का प्रतीक माना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में यही त्योहार अलग नामों से मनाया जाता है, जैसे पूर्वी भारत में मकर संक्रांति, पंजाब में लोहड़ी और गुजरात में उत्तरायण।
पंचांग के अनुसार, थाई पोंगल संक्रांति 14 जनवरी को दोपहर 3 बजकर 13 मिनट पर होगी। द्रिक पंचांग के मुताबिक पोंगल का पावन पर्व इसी दिन से शुरू होता है। यह तमिल कैलेंडर के थाई महीने का पहला दिन माना जाता है, जो बेहद शुभ होता है। पोंगल चार दिनों तक मनाया जाता है। इन चारों दिनों का अपना अलग महत्व होता है और यह समय नई फसल, प्रकृति और सूर्य देव के प्रति आभार जताने का अवसर देता है।
पहला दिन: भोगी पोंगल (14 जनवरी)
पोंगल का पहला दिन भोगी पोंगल कहलाता है, जिसे इस साल 14 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन लोग अपने घरों की अच्छी तरह सफाई करते हैं और पुरानी व बेकार चीजों को हटा देते हैं या जला देते हैं। इसका मतलब होता है पुराने को पीछे छोड़कर नई शुरुआत करना। भोगी पोंगल को नकारात्मकता से दूर होकर जीवन में नई उम्मीद और सकारात्मक सोच लाने का दिन माना जाता है। इसी उत्साह और नई ऊर्जा के साथ लोग पोंगल पर्व की शुरुआत करते हैं।
दूसरा दिन: सूर्य पोंगल (15 जनवरी)
पोंगल का दूसरा दिन सूर्य पोंगल कहलाता है। ये दिन सूर्य देव की पूजा और नई फसल के लिए धन्यवाद देने का होता है। खेती और प्रकृति के प्रति आभार जताने के लिए इस दिन खास पूजा की जाती है। घरों के आंगन में रंग-बिरंगी कोल्लम बनाई जाती है, जो खुशहाली और समृद्धि का संकेत मानी जाती है। इसी दिन चावल, दूध और गुड़ से बनी खास पोंगल खीर पकाई जाती है और सूर्य देव को अर्पित की जाती है। सूर्य पोंगल पूजा के साथ-साथ परिवार और समाज को जोड़ने वाला पर्व भी है।
तीसरा दिन: मट्टू पोंगल (16 जनवरी)
पोंगल का तीसरा दिन मट्टू पोंगल के रूप में मनाया जाता है। यह दिन खेती में साथ देने वाले गाय, बैल और कृषि से जुड़े साधनों के सम्मान के लिए होता है। किसान अपने पशुओं को नहलाकर सजाते हैं और उनकी मेहनत के लिए आभार जताते हैं। मट्टू पोंगल यह याद दिलाता है कि खेती में पशुओं की भूमिका कितनी अहम है।
चौथा दिन: कन्नुम पोंगल (17 जनवरी)
पोंगल का चौथा और आखिरी दिन कन्नुम पोंगल होता है, जो परिवार और रिश्तों को समर्पित रहता है। इस दिन सभी लोग मिलकर साथ भोजन करते हैं, बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं और अपने प्रियजनों से मुलाकात करते हैं। कन्नुम पोंगल आपसी प्रेम, अपनापन और मिलजुलकर खुशियां बांटने का पर्व है, जो पूरे माहौल को उल्लास से भर देता है।