रियलमी में छंटनी! अब अलग नहीं रहेगा स्मार्टफोन बिजनेस, Oppo के भीतर काम करेगा ब्रांड
चाइनीज कंपनी Oppo ने भारत में Realme के ऑपरेशंस को अपने भीतर समेटना शुरू कर दिया है। Realme अब अलग कंपनी नहीं रहेगी। इस कंसोलिडेशन के चलते सेल्स और सपोर्ट टीमों में छंटनी शुरू हो चुकी है। जानिए डिटेल।
Realme और Oppo की ब्रांड पहचान और फ्रंट एंड मार्केटिंग अलग ही रहेगी।
चीनी स्मार्टफोन कंपनी Oppo ने Realme के ऑपरेशंस को अपने भीतर समेटना शुरू कर दिया है। इसकी शुरुआत सेल्स और सपोर्ट टीमों से हुई है, जहां रोल्स घटाए जा रहे हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब भारत का स्मार्टफोन बाजार बेहद प्रतिस्पर्धी हो चुका है। अब कंपनियां खर्च कम करने के रास्ते तलाश रही हैं।
Realme फिर बनेगा Oppo का सब-ब्रांड
यह बदलाव Oppo की ग्लोबल स्ट्रैटजी का हिस्सा है। इसके तहत Realme को दोबारा Oppo के तहत एक सब ब्रांड की तरह पोजिशन किया जा रहा है। इसका मकसद साफ है कि संसाधनों को एक साथ लाना और एक ही ढांचे के तहत काम करके खर्च कम करना।
इस मामले से जुड़े एक सूत्र के मुताबिक, चीन में यह प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है। भारत में स्थिति थोड़ी अलग है, क्योंकि Oppo से जुड़े कुछ कानूनी मामले अभी चल रहे हैं। इसी वजह से यहां यह बदलाव धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा।
Oppo-Realme की शुरुआत मर्जर
सूत्रों के अनुसार, मर्जर की प्रक्रिया भारत में शुरू हो चुकी है। Realme की सेल्स टीमों को नए स्ट्रक्चर में शिफ्ट होने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं, सेल्स और सर्विस नेटवर्क से जुड़े कर्मचारियों से 30 अप्रैल तक इस्तीफा देने को कहा गया है।
आगे चलकर Oppo की मार्केटिंग और सर्विस नेटवर्क संयुक्त ऑपरेशंस का बड़ा हिस्सा संभालेंगे। आने वाले महीनों में जैसे जैसे यह प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, और भी वर्टिकल इसकी चपेट में आ सकते हैं।
Realme की शुरुआत और वापसी की कहानी
Realme को 2018 में Oppo के सब ब्रांड के तौर पर लॉन्च किया गया था। उसी साल बाद में इसे एक स्वतंत्र ब्रांड के रूप में अलग कर दिया गया। इसका मकसद बजटसेगमेंट में शाओमी के रेडमी को टक्कर देना था।
Realme का पहला फोन Realme 1 था, जिस पर साफ तौर पर 'By Oppo' लिखा होता था। करीब आठ साल बाद अब Realme एक बार फिर उसी जगह लौटता दिख रहा है, जहां से उसकी शुरुआत हुई थी यानी Oppo के दायरे में।
2021 में भी दिख चुका है ऐसा मॉडल
भारत में इससे पहले भी ऐसा कंसोलिडेशन देखा जा चुका है। साल 2021 में OnePlus और Oppo के बीच नजदीकी बढ़ी थी। उस समय रिसर्च एंड डेवलपमेंट और कई ऑपरेशनल फंक्शंस को आपस में मिला दिया गया था।
सूत्रों के मुताबिक, चीन में इस तरह के फैसले मुख्य रूप से लागत घटाने के लिए लिए गए।
पैरेंट एक, तो ऑपरेशंस अलग क्यों
एक सूत्र ने बताया, 'जब दोनों ब्रांड एक ही पैरेंट कंपनी के तहत आते हैं, तो पूरी तरह अलग अलग ऑपरेशंस चलाने का क्या मतलब है। बेहतर है कि सब ब्रांड्स को एक ही छत के नीचे रखा जाए, ऑपरेशंस को अलाइन किया जाए और खर्च कम किया जाए।'
ग्लोबल स्मार्टफोन बाजार पर दबाव है। ऐसे में एक ही पैरेंट के तहत अलग अलग ढांचे चलाना आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं रह गया है। आखिरकार, इस पूरे माली की सबसे बड़ी वजह लागत ही है।
BBK की विरासत है ये कंपनियां
BBK Electronics Corporation को लंबे समय तक चीनी स्मार्टफोन कंपनियों का मार्गदर्शक माना जाता रहा है। इसे 2023 में डीरजिस्टर कर दिया गया था। इसके पोर्टफोलियो में Oppo, Vivo, OnePlus और Realme जैसे बड़े ब्रांड शामिल रहे हैं।
भारत में फोकस कहां रहेगा
कई सूत्रों का कहना है कि भारत में कंसोलिडेशन का सबसे ज्यादा असर सपोर्ट और ऑपरेशनल फंक्शंस पर पड़ेगा। खासकर आफ्टर सेल्स और ऑफलाइन डिस्ट्रीब्यूशन जैसे क्षेत्रों में, जहां कर्मचारियों की संख्या ज्यादा होती है। रिसर्च एंड डेवलपमेंट पहले से ही काफी हद तक दोनों ब्रांड्स के बीच साझा है।
इस मामले पर Moneycontrol के भेजे सवालों पर Oppo और Realme ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
ब्रांड अलग, बैकएंड साझा
सूत्रों के मुताबिक, Realme और Oppo की ब्रांड पहचान और फ्रंट एंड मार्केटिंग अलग ही रहेगी। लेकिन बैकएंड रिसोर्सेज एक साथ चलाए जाएंगे। जैसे कि सप्लाई चेन, सर्विस और सपोर्ट सिस्टम।
यह मॉडल Vivo जैसा होगा, जहां iQOO को कभी अलग कंपनी नहीं बनाया गया। वह आज भी Vivo के भीतर ही काम करती है। भारत में Vivo का यह मॉडल काफी सफल रहा है।
बढ़ती लागत और कड़ी प्रतिस्पर्धा
एनालिस्टों का मानना है कि Oppo का यह कदम बढ़ती प्रतिस्पर्धा और खर्च के दबाव से निपटने की रणनीति है। मेमोरी जैसे कंपोनेंट्स की कीमतें बढ़ रही हैं। इसके अलावा R&D, सप्लाई चेन और आफ्टर सेल्स सिस्टम पर भी खर्च लगातार बढ़ा है।
Counterpoint Research के रिसर्च डायरेक्टर तरुण पाठक के मुताबिक, बड़े स्मार्टफोन ब्रांड्स अब सब-ब्रांड स्ट्रैटेजी की ओर बढ़ रहे हैं, ताकि संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सके। खासकर वे ब्रांड्स, जिनकी वैश्विक शिपमेंट 50 मिलियन यूनिट से ज्यादा है।
आक्रामक विस्तार से अनुशासन की ओर
पाठक का कहना है कि अब स्मार्टफोन कंपनियों की रणनीति 'तेज विस्तार' से हटकर ज्यादा अनुशासित हो रही है। प्रोडक्ट पोर्टफोलियो में ओवरलैप कम किया जाएगा और अहम बाजारों पर ही ज्यादा फोकस रहेगा।
इसी वजह से आने वाले एक से दो साल में ये ब्रांड्स गैर जरूरी या कम प्राथमिकता वाले बाजारों को लेकर ज्यादा सतर्क रुख अपना सकते हैं।