आज के दौर में जहां बच्चों की दुनिया मोबाइल, वीडियो गेम और सोशल मीडिया के आसपास घूमती है, वहीं 13 साल का आगम जैन एक अलग ही मिसाल बनकर सामने आया है। इतनी छोटी उम्र में उसने भौतिक सुख-सुविधाओं से दूरी बनाकर अध्यात्म का रास्ता चुन लिया है। करोड़ों के कारोबार वाले परिवार से होने के बावजूद उसका मन इन चीजों में नहीं लगा और उसने सादगी भरा जीवन अपनाने का फैसला लिया।
आमतौर पर इस उम्र में बच्चे सपनों और मौज-मस्ती में रहते हैं, लेकिन आगम ने वैराग्य का रास्ता चुनकर सबको हैरान कर दिया है। उसका ये फैसला लोगों को सोचने पर मजबूर कर रहा है कि असली खुशी सिर्फ पैसे में नहीं, बल्कि मन की शांति में होती है।
पैसे की कमी नहीं, फिर भी मन वैरागी
आगम सूरत के बड़े टेक्सटाइल कारोबारी दिलीप जैन का बेटा है, जिनका सालाना कारोबार 10 करोड़ के आसपास है। लेकिन आगम को इन चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं, उसका मन बचपन से ही अध्यात्म में लग गया।
6 साल की उम्र में बदल गई सोच
जब आगम सिर्फ 6 साल का था, तब उसने जैन संत रत्नचंद्र सूरीश्वर महाराज के प्रवचन सुने। बस तभी से उसके मन में वैराग्य आ गया और उसने अलग राह चुन ली।
4500 किमी नंगे पैर चलकर दिखाया जुनून
आगम ने छोटी उम्र में ही तपस्या शुरू कर दी। 8 साल की उम्र में 48 दिन का कठिन तप किया और नंगे पैर लंबी यात्राएं कीं। अब तक वह करीब 4500 किलोमीटर पैदल चल चुका है।
स्कूल छोड़ा, गुरुकुल अपनाया
चौथी के बाद उसने स्कूल छोड़ दिया और गुरुकुल में रहकर धार्मिक पढ़ाई कर रहा है। मुंबई, सूरत, पालीताणा और गिरनार जैसे जगहों पर संतों के साथ यात्रा भी कर चुका है।
दुनिया के रिश्ते सब अस्थायी हैं
लोकल 18 से बात करते हुए आगम ने बताया कि दुनिया के रिश्ते टिकाऊ नहीं होते। असली खुशी भगवान महावीर के रास्ते पर चलने में है और मोह छोड़ने से ही मोक्ष मिलता है।
21 अप्रैल से दीक्षा कार्यक्रम शुरू होगा, 22 अप्रैल को जुलूस निकलेगा और 23 अप्रैल को पालीताणा में आगम जैन संत बन जाएगा।
इतनी कम उम्र में इतना बड़ा फैसला लेकर आगम आज सबके लिए मिसाल बन गया है। उसने दिखा दिया कि सच्ची खुशी पैसे में नहीं, मन की शांति में होती है।