हवाई जहाज में सफर करते वक्त टॉयलेट का इस्तेमाल तो हम आसानी से कर लेते हैं, लेकिन शायद ही कभी यह सोचते हैं कि फ्लश करने के बाद आखिर सारा कचरा जाता कहां है। जमीन पर घर के टॉयलेट में फ्लश करने पर पानी और गंदगी पाइपलाइन के जरिए सीवेज सिस्टम तक पहुंचती है, लेकिन विमान में कहानी बिल्कुल अलग है। हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ते विमान में न तो सामान्य सीवर लाइन होती है और न ही कचरे को बाहर फेंकने का कोई तरीका। फिर भी हर फ्लश के बाद टॉयलेट कुछ ही सेकंड में साफ हो जाता है। इसके पीछे एक खास तकनीक काम करती है, जो बहुत कम पानी में तेज सक्शन के जरिए कचरे को खींच लेती है। लेकिन यह गंदगी आखिर विमान के किस हिस्से में जमा होती है और जमीन पर उतरने के बाद उसे कैसे निकाला जाता है? यही पूरा सिस्टम काफी दिलचस्प है।
फ्लश दबाते ही आती है तेज ‘वूश’ आवाज
अगर आपने प्लेन के टॉयलेट में फ्लश किया है, तो आपने जरूर महसूस किया होगा कि उसकी आवाज घर के टॉयलेट से काफी ज्यादा तेज होती है। इसकी वजह है वैक्यूम फ्लशिंग सिस्टम। बटन दबाते ही एक शक्तिशाली सक्शन सक्रिय होता है, जो कचरे को तेजी से पाइप के अंदर खींच लेता है। यही तेज दबाव वाली हवा और सक्शन वह खास ‘वूश’ आवाज पैदा करते हैं, जो विमान के टॉयलेट की पहचान बन चुकी है।
पानी कम, लेकिन सक्शन का काम ज्यादा
घर के टॉयलेट में आमतौर पर काफी मात्रा में पानी इस्तेमाल होता है, लेकिन विमान में ऐसा करना संभव नहीं है। विमान को हर अतिरिक्त किलो वजन के लिए ईंधन खर्च करना पड़ता है, इसलिए पानी की खपत कम रखना जरूरी होता है। वैक्यूम सिस्टम इसी काम में मदद करता है। बेहद कम पानी के साथ तेज सक्शन कचरे को पाइप के जरिए आगे पहुंचा देता है।
क्या कचरा विमान से नीचे गिरता है?
यही शायद सबसे बड़ा सवाल है और इसका जवाब है नहीं। फ्लश होने के बाद कचरा किसी खुले हिस्से से बाहर नहीं जाता। यह एक बंद पाइपलाइन के जरिए विमान के अंदर मौजूद एक विशेष वेस्ट होल्डिंग टैंक तक पहुंचता है। यह टैंक उड़ान के दौरान कचरे को सुरक्षित तरीके से अपने अंदर रखता है। यानी विमान आसमान में उड़ रहा हो या बादलों के ऊपर हजारों फीट की ऊंचाई पर हो, टॉयलेट का कचरा विमान के अंदर ही एक निर्धारित सिस्टम में रहता है।
फिर लैंडिंग के बाद क्या होता है?
विमान के एयरपोर्ट पर पहुंचने के बाद असली ‘सफाई का काम’ शुरू होता है। इसके लिए एयरपोर्ट पर विशेष ग्राउंड सर्विस वाहन मौजूद रहते हैं। इन वाहनों की मदद से विमान के बाहर बने सर्विसिंग पैनल से वेस्ट टैंक को एक विशेष होज के जरिए जोड़ा जाता है। इसके बाद टैंक में जमा कचरे को बाहर निकालकर एयरपोर्ट की निर्धारित वेस्ट-हैंडलिंग व्यवस्था तक पहुंचाया जाता है।
आखिर विमान में ऐसा सिस्टम क्यों लगाया गया?
विमान के टॉयलेट को इस तरह डिजाइन करने के पीछे सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि वजन और पानी की बचत भी बड़ी वजह है। अगर हर फ्लश में घर के टॉयलेट जितना पानी इस्तेमाल हो, तो उड़ान के दौरान विमान को भारी मात्रा में अतिरिक्त पानी ढोना पड़ेगा। वैक्यूम सिस्टम कम पानी में काम पूरा करता है और विमान के वजन को नियंत्रित रखने में मदद करता है।
अगली बार विमान में फ्लश करते समय आने वाली तेज आवाज आपको शायद थोड़ी कम रहस्यमय लगेगी। उस ‘वूश’ के पीछे कोई कचरा आसमान से नीचे नहीं गिर रहा होता, बल्कि एक खास वैक्यूम सिस्टम उसे तेजी से बंद पाइपलाइन के जरिए विमान के वेस्ट टैंक तक पहुंचा रहा होता है। यानी आसमान में उड़ते विमान का टॉयलेट भी अपने आप में एक छोटा-सा इंजीनियरिंग सिस्टम है, जो कम पानी में सफाई और सुरक्षा दोनों का काम संभालता है।