Bihar Train News: बिहार के खगड़िया जिले में जब बाढ़ दस्तक देती है, तो एक खास पैसेंजर ट्रेन इलाके में चर्चा का विषय बन जाती है। 'न्यूज 18' के मुताबिक, हालांकि इंडियन रेलवे के रिकॉर्ड में इस ट्रेन का नाम 'समस्तीपुर-सहरसा पैसेंजर' है। लेकिन स्थानीय लोग इसे प्यार से 'घास ट्रेन' भी कहते हैं। बाढ़ के मुश्किल दिनों में यह ट्रेन सिर्फ यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम नहीं करती। बल्कि सैकड़ों पशुपालकों और उनके मवेशियों के लिए 'लाइफलाइन' बन जाती है।
जब हर तरफ पानी भर जाता है तब सैकड़ों पशुपालक सुबह-सुबह इस पैसेंजर ट्रेन में सवार होकर सूखे इलाकों की ओर जाते हैं। वे चिलचिलाती धूप में अपने मवेशियों के लिए हरा चारा काटते हुए दिन बिताते हैं। फिर शाम को वे सभी भारी बंडलों के साथ रेलवे स्टेशन लौट आते हैं।
बाढ़ में मवेशियों के सामने चारे का संकट
रिपोर्ट के मुताबिक, खगड़िया के मानसी प्रखंड के निचले इलाकों में हर साल बाढ़ का पानी भर जाता है। इस दौरान धमसारा घाट, मटिहानी और रोहियार जैसे गांवों के आसपास के बड़े हिस्से जलमग्न हो जाते हैं। खेत और चरागाह पानी में डूब जाते हैं। पशुपालकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मवेशियों के लिए हरे चारे का इंतजाम करना होती है। मवेशियों पर निर्भर परिवारों के लिए उन्हें भूखा रखना संभव नहीं होता। ऐसे में पशुपालक रोजाना बाढ़ प्रभावित इलाके से बाहर निकलकर सूखे एरिया का रुख करते हैं, जहां उन्हें हरा चारा मिल सके।
सुबह ट्रेन में सवार होते हैं सैकड़ों पशुपालक
सुबह होते ही बड़ी संख्या में पशुपालक इस पैसेंजर ट्रेन में सवार हो जाते हैं। उनका मकसद किसी शहर में खरीदारी या काम के लिए जाना नहीं, बल्कि अपने मवेशियों के लिए चारा जुटाना होता है। ट्रेन उन्हें उन इलाकों तक पहुंचाने में मदद करती है जहां बाढ़ का असर कम है। और वहां हरा चारा उपलब्ध है।
वहां पहुंचने के बाद पशुपालक दिनभर तेज धूप और गर्मी के बीच खेतों और खुले इलाकों से हरी घास काटते हैं। यह उनके लिए रोज का संघर्ष है। लेकिन अपने मवेशियों को बचाए रखने के लिए वे इस मेहनत को मजबूरी के साथ-साथ जिम्मेदारी के तौर पर भी निभाते हैं।
शाम होते ही ट्रेन का नजारा हो जाता है बिल्कुल अलग
दिनभर चारा काटने के बाद शाम को यही पशुपालक भारी-भारी गठरियों और बोरियों के साथ स्टेशन लौटते हैं। इसके बाद जब ट्रेन फकीया की ओर वापस रवाना होती है, तो इसका नजारा किसी आम पैसेंजर ट्रेन जैसा नहीं रहता। ट्रेन के दरवाजों से लेकर शौचालयों तक, लगभग हर जगह हरा चारा नजर आता है। डिब्बों में बड़ी-बड़ी गठरियां और बोरियां रखी होती हैं। उनके बीच बैठकर पशुपालक अपने घरों की ओर लौटते हैं।
इसी वजह से पड़ा नाम 'घास ट्रेन'
स्थानीय लोगों के बीच यह ट्रेन धीरे-धीरे इतनी मशहूर हो गई कि इसका आधिकारिक नाम पीछे छूट गया और इसे 'घास ट्रेन' के नाम से पहचान मिलने लगी। न्यूज 18 के मुताबिक, बाढ़ के दौरान जब गांवों में पशुओं के लिए चारा जुटाना मुश्किल हो जाता है, तब यही ट्रेन पशुपालकों को सूखे इलाकों तक पहुंचाने और वहां से चारा वापस लाने का जरिया बनती है।
पशुपालकों और मवेशियों दोनों के लिए जीवनरेखा
फकीया इलाके के पशुपालकों के लिए यह ट्रेन महज एक यात्री ट्रेन नहीं है। बाढ़ जैसे कठिन हालात में यह उनके परिवार और मवेशियों दोनों को संभालने में अहम भूमिका निभाती है। एक तरफ जहां देश में 'वंदे भारत' और 'राजधानी एक्सप्रेस' जैसी ट्रेनों की रफ्तार और सुविधाओं की चर्चा होती है।
वहीं, बिहार के इस बाढ़ प्रभावित इलाके में एक साधारण पैसेंजर ट्रेन अपनी अलग ही वजह से लोगों के लिए बेहद खास है। इसीलिए हर साल बाढ़ के मौसम में जब यह ट्रेन हरे चारे की गठरियों से भरकर लौटती है, तो लोग इसे फिर उसी प्यार और सम्मान से 'घास ट्रेन' कहकर पुकारते हैं।