Civil Lines: केंद्र सरकार अंग्रेजों की विरासत को समाप्त करने के अपने अभियान को आगे बढ़ाते हुए अब 'सिविल लाइन्स' नाम को हमेशा के लिए बदलने पर विचार कर रही है। 'सिविल लाइन्स' ब्रिटिश शासन के दौरान बनाए गए रिहायशी इलाके थे। ये ऐतिहासिक रूप से प्रशासनिक सत्ता से जुड़े थे। लेकिन अब जल्द ही 'सिविल लाइन्स' नाम इतिहास का हिस्सा बन जाएगा। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार औपनिवेशिक काल के कानूनों और तौर-तरीकों को भारतीय परंपराओं और संस्कृति पर आधारित व्यवस्थाओं से बदलने के प्रयास तेज कर रही है।
इस क्रम में "सिविल लाइन्स" को भी समीक्षा के दायरे में आने वाली ऐसी ही एक निशानी के तौर पर पहचाना गया है। राजधानी दिल्ली समेत कई अन्य बड़े शहरों में सिविल लाइन्स इलाके मौजूद हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक गुलामी की सभी निशानियों को मिटाने की बात कही है। ब्रिटिश राज की निशानियों की पहचान करने और उन्हें धीरे-धीरे खत्म करने के लिए एक व्यापक अभियान चल रहा है। यह मानसिकता को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करने और एक स्वदेशी पहचान को बढ़ावा देने के बड़े प्रयास का हिस्सा है।
इसी साल जनवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों से औपनिवेशिक काल के तौर-तरीकों की पहचान करने और भारतीय परंपराओं पर आधारित विकल्प सुझाने को कहा था। मूल रूप से 19वीं सदी में विकसित "सिविल लाइन्स" को बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर वाले हाईटेक रिहायशी इलाकों के तौर पर डिजाइन किया गया था। ये सत्ता और औपनिवेशिक शक्ति से निकटता का प्रतीक था।
इन राज्यों में अभी भी मौजूद
ये इलाके वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारियों के रहने के लिए बनाए गए थे। ये भीड़भाड़ वाले पुराने शहरों और बाजारों से बिल्कुल अलग थे। सिविल लाइन्स के इलाके आज भी दिल्ली के अलावा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र में मौजूद हैं। ये लंबे समय से अपने आस-पास के शहरी इलाकों से एक अलग पहचान बनाए हुए हैं।
ब्रिटिश काल की शहरी योजना और वास्तुकला का गहन अध्ययन करने वाले एक शहरी योजनाकार और वास्तुकार ने अखबार को बताया, "सिविल लाइन्स का विकास एक सुनियोजित विकास का हिस्सा था। शहर के एक तरफ छावनी बोर्ड होता था। दूसरी तरफ सिविल लाइन्स। इसी तरह शहरों का विकास हुआ है।"
बदलाव की हो चुकी है शुरुआत
दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के पूर्व आयुक्त (योजना) ए.के. जैन ने कहा कि देश भर में सिविल लाइन्स के इलाकों में पिछले कुछ वर्षों में पूरी तरह से बदलाव आ गया है। उन्होंने TOI को बताया, "बंगलों की जगह अब बहुमंजिला इमारतें बन गई हैं। आबादी कई गुना बढ़ गई है। ये इलाके मुख्य शहर का ही हिस्सा बन गए हैं। इसलिए, नाम बदलने का अब शायद ही कोई वास्तविक महत्व रह गया है।"
उनके अनुसार, औपनिवेशिक काल के दौरान पूरे भारत में लगभग 75 छावनियां बनाई गई थीं। सिविल लाइन्स इन सैन्य इलाकों के नागरिक समकक्ष के रूप में काम करती थीं। पिछले एक दशक में सरकार ने कई ऐसी प्रमुख सड़कों और दफ्तरों के नाम भी बदल दिए हैं, जिनका औपनिवेशिक काल से गहरा जुड़ाव था। इसका एक प्रमुख उदाहरण दिल्ली में 'रेस कोर्स रोड' का नाम बदलकर 'लोक कल्याण मार्ग' किया जाना है। हालांकि, सिविल लाइन को लेकर अभी सरकार की तरफ से इस बारे में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।