दुनिया में कई संस्कृतियों में जानवरों को देवता का रूप मानकर पूजा जाता है। कहीं गाय को मां माना जाता है, तो कहीं हाथी को भगवान गणेश का प्रतीक समझा जाता है। लेकिन ताइवान का एक अनोखा त्योहार "पिग्स ऑफ गॉड" यानी "ईश्वर के सुअर" इस आस्था से बिल्कुल अलग और हैरान करने वाला पहलू सामने लाता है। ये त्योहार श्रद्धा के बजाय अपनी क्रूर परंपराओं के लिए जाना जाता है। इस खास अवसर पर सैकड़ों सुअरों को पहले जबरदस्ती खिलाकर अस्वाभाविक रूप से मोटा किया जाता है और फिर उनका खुलेआम गला रेत दिया जाता है। ताइवान के हक्का समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला ये त्योहार कई बार विवादों में भी आ चुका है।
जहां कुछ लोग इसे परंपरा और धार्मिक भावना का प्रतीक मानते हैं, वहीं पशु अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन इसे अमानवीय और क्रूर प्रथा बताते हैं। यही वजह है कि ये त्योहार हर साल चर्चा में आ जाता है।
ताइवान में रहने वाला हक्का समुदाय (Hakka community), जिसकी आबादी लगभग 40 लाख है, इस त्योहार को परंपरा और धार्मिक भावना से जोड़कर देखता है। इनके अनुसार, सबसे मोटे सुअर की बलि देना ईश्वर को प्रसन्न करने का तरीका है। लेकिन इस आस्था के पीछे छिपी क्रूरता की कहानी बेहद डरावनी है।
दो साल पहले शुरू होती है ‘बलिदान’ की तैयारी
इस त्योहार की तैयारी कोई एक-दो दिन की नहीं होती, बल्कि दो साल पहले से सुअरों को जबरन अत्यधिक भोजन खिलाकर उनका वजन बढ़ाया जाता है। रोजाना 100 किलो तक भोजन ठूंस-ठूंस कर खिलाया जाता है ताकि वो जल्दी मोटे हो जाएं। मोटा सुअर यहां श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है, लेकिन इस प्रक्रिया में जानवर की हालत दयनीय हो जाती है।
बिना दवा के कराया जाता है ऑपरेशन
मोटा बनाने की इस होड़ में कभी-कभी सुअरों को बिना एनेस्थीसिया के कैस्ट्रेशन (नपुंसक बनाना) तक किया जाता है ताकि वे प्रजनन न कर सकें और उनका वजन तेजी से बढ़े। ये प्रक्रिया उन्हें असहनीय पीड़ा देती है, मगर आयोजकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
जबरदस्ती खिलाया जाता है सीसा और रेत
त्योहार से कुछ दिन पहले, सुअरों को प्राकृतिक खाना नहीं, बल्कि सीसा और रेत जैसे भारी पदार्थ जबरन खिलाए जाते हैं ताकि उनका वजन और बढ़ जाए। ये न सिर्फ अमानवीय है बल्कि सुअर के जीवन के साथ सीधा खिलवाड़ है।
जुलूस से पहले होती है खुलेआम हत्या
त्योहार वाले दिन इन सुअरों को भीड़ के सामने घसीटकर लाया जाता है और फिर उनका गला रेतकर मार डाला जाता है। इसके बाद उनके शव को सजा-धजाकर एक वाहन में रखकर पूरे इलाके में जुलूस निकाला जाता है। ये ‘शक्ति प्रदर्शन’ धार्मिक आस्था के नाम पर होता है, लेकिन इसका दृश्य दिल दहला देने वाला होता है।
आटे के सुअरों से दी जा रही है चुनौती
एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट इस क्रूर परंपरा के खिलाफ लगातार आवाज उठा रहे हैं। इसके असर से कुछ इलाकों में अब मैदे या आटे से बने नकली सुअरों का इस्तेमाल किया जाने लगा है, जिन्हें ही जुलूस में ले जाया जाता है। हालांकि ये बदलाव धीरे-धीरे आ रहे हैं, पर पूरी तरह से परंपरा खत्म नहीं हुई है।
धार्मिक आस्था बनाम करुणा की जंग
"पिग्स ऑफ गॉड" त्योहार एक ऐसा उदाहरण बनकर सामने आता है, जहां आस्था के नाम पर जानवरों के साथ अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी जाती हैं। सवाल यही उठता है—क्या कोई भी परंपरा इतनी निर्दयी हो सकती है कि उसमें किसी प्राणी को दर्द और मौत की सजा दी जाए?