दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कई ऐसी परंपराएं और रीति-रिवाज देखने को मिलते हैं, जो सुनने में बेहद अजीब और हैरान करने वाले होते हैं। लेकिन इंडोनेशिया के पापुआ प्रांत में रहने वाली दानी जनजाति की एक परंपरा ऐसी है, जिसे जानकर किसी की भी रूह कांप सकती है। इस समुदाय में किसी प्रियजन की मौत के बाद शोक मनाने का तरीका सामान्य नहीं, बल्कि बेहद दर्दनाक और दिल दहला देने वाला माना जाता है। यहां दुख जताने के लिए जो तरीका अपनाया जाता है, वो आधुनिक सोच और मानवता दोनों को सोचने पर मजबूर कर देता है।
ये परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी कुछ इलाकों में इसकी झलक देखने को मिल जाती है। यही वजह है कि यह प्रथा अक्सर दुनिया भर में चर्चा और विवाद का विषय बनी रहती है।
‘इकिपाल’ परंपरा का खौफनाक सच
दानी जनजाति में इसे ‘इकिपाल’ कहा जाता है। जब परिवार के मुखिया या किसी प्रियजन की मृत्यु होती है, तो शोक जताने के लिए परिवार के सदस्य अपनी उंगलियां काट देते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से मृत आत्मा को शांति मिलती है और उनका दुख सही मायने में व्यक्त होता है।
दर्द से भरी अनोखी प्रक्रिया
इस परंपरा में पहले उंगलियों को लगभग 30 मिनट तक कसकर बांधा जाता है ताकि वह हिस्सा सुन्न हो जाए। इसके बाद धारदार हथियार से उंगली का ऊपरी हिस्सा काट दिया जाता है। कई लोग इस दर्द को अपनी श्रद्धा और प्रेम का प्रतीक मानते हैं और इसे चुपचाप सह लेते हैं।
राख और मिट्टी से जुड़ा शोक
उंगली काटने के बाद उस हिस्से को सुखाकर जलाया जाता है और उसकी राख को संभालकर रखा जाता है। शोक व्यक्त करने के लिए लोग अपने चेहरे पर मिट्टी और राख भी लगाते हैं, जो उनके दुख और परंपरा का प्रतीक माना जाता है।
महिलाओं और बच्चों पर सबसे ज्यादा असर
इस परंपरा की सबसे बड़ी मार महिलाओं और बच्चों पर पड़ती है। कई बुजुर्ग महिलाओं के हाथों में उंगलियां नहीं बची होतीं, क्योंकि हर मौत पर उन्हें यह दर्द सहना पड़ता है। यह दृश्य इस परंपरा की क्रूरता को और भी डरावना बना देता है।
सरकार की रोक के बावजूद जारी परंपरा
इंडोनेशिया सरकार ने इस प्रथा पर आधिकारिक रूप से रोक लगा दी है, लेकिन दूर-दराज के जंगलों में रहने वाले लोग आज भी इसे गुप्त रूप से निभाते हैं। उनका मानना है कि ऐसा न करने पर आत्मा नाराज हो सकती है और परिवार पर विपत्ति आ सकती है।
संस्कृति या अंधविश्वास का सवाल
हालांकि अब नई पीढ़ी इस परंपरा से दूरी बना रही है, लेकिन ये सवाल आज भी बना हुआ है कि क्या ये संस्कृति का हिस्सा है या केवल एक गहरा अंधविश्वास, जो इंसानी दर्द को परंपरा का नाम दे देता है।