दुनिया की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ पैसा या सेना नहीं, बल्कि यात्रा की आजादी भी हो सकती है। सोचिए, बिना पासपोर्ट के पूरी दुनिया घूमना कितना अद्भुत अनुभव होगा! यकीन मानिए, ऐसा सिर्फ तीन लोगों के लिए मुमकिन है—ब्रिटेन के किंग चार्ल्स तृतीय, जापान के सम्राट नरुहितो और उनकी पत्नी सम्राज्ञी मसाको। ये तीनों राजघराने अपनी शाही स्थिति के कारण बिना किसी वीजा या पासपोर्ट के दुनियाभर में एंट्री ले सकते हैं। आम नेताओं और देशों के प्रमुखों को भी डिप्लोमैटिक पासपोर्ट की जरूरत होती है, लेकिन ये शाही परिवार इससे मुक्त हैं।
उनकी यात्राएं सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राजकीय और डिप्लोमैटिक उद्देश्य से होती हैं। ब्रिटेन में “हिज मैजेस्टीज पासपोर्ट” और जापान में प्रतीकात्मक संप्रभुता जैसी विशेष व्यवस्थाएं इन्हें इस अद्भुत आजादी देती हैं। ये शक्ति, सम्मान और वैश्विक प्रभाव का अनोखा मिश्रण है।
यूनाइटेड किंगडम के पासपोर्ट किंग के नाम पर जारी होते हैं,“हिज मैजेस्टीज पासपोर्ट” लिखा होता है। इसलिए किंग चार्ल्स को खुद पासपोर्ट लेने की जरूरत नहीं पड़ती। वे देश के संप्रभु हैं और उनका शब्द कानून की तरह माना जाता है। क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय के समय भी यही नियम था। 2023 में चार्ल्स के राजतिलक के बाद ये विशेषाधिकार और भी सशक्त हो गया।
जापान में सम्राट का विशेष दर्जा
जापान में सम्राट नरुहितो और सम्राज्ञी मसाको प्रतीकात्मक संप्रभु माने जाते हैं। उन्हें पासपोर्ट जारी नहीं किया जाता बल्कि डिप्लोमैटिक प्रोटोकॉल के तहत यात्रा करने की अनुमति होती है। 2019 में नरुहितो की पहली विदेश यात्रा ब्रिटेन की थी, जिसमें उन्हें बिना किसी कागजी प्रक्रिया के स्वागत मिला।
व्यापक अधिकार और इम्यूनिटी
ये विशेषाधिकार सिर्फ यात्रा तक सीमित नहीं है। इन्हें डिप्लोमैटिक इम्यूनिटी भी मिलती है, यानी किसी देश में गिरफ्तारी या जांच से बचाव। उदाहरण के लिए, 2024 में सम्राज्ञी मसाको की यूरोप यात्रा के दौरान फ्रांस ने उन्हें वीजा-मुक्त सुरक्षा दी। किंग चार्ल्स की ऑस्ट्रेलिया यात्रा में एयरपोर्ट पर रेड कार्पेट बिछा दिया गया। जापान में सम्राट को ‘टेननो’ कहा जाता है, जिसे देवताओं का वंशज माना जाता है।
भारत और सामान्य लोगों के लिए फर्क
भारत में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को डिप्लोमैटिक पासपोर्ट मिलता है, लेकिन वीजा आवश्यक होता है। पीएम मोदी की विदेशी यात्राओं में हमेशा कागजी प्रक्रिया का पालन हुआ। जबकि जापान और ब्रिटेन के राजघरानों की यात्राओं में सरकार और फॉरेन ऑफिस सीधे प्रोटोकॉल संभालते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये नियम वैश्विक डिप्लोमेसी को मजबूत करते हैं, लेकिन आम व्यक्ति के लिए ये बस एक सपना ही है।