Christmas 2025: ईसा मसीह को मानते हैं मुसलमान, फिर भी क्रिसमस से क्यों रखते हैं दूरी?

Christmas 2025: हर साल 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाया जाता है, जिसे ईसाई यीशु मसीह के जन्म दिवस के रूप में देखते हैं। वहीं मुसलमान भी ईसा मसीह का सम्मान करते हैं, लेकिन क्रिसमस नहीं मनाते। इसे लेकर लोगों के मन में अक्सर सवाल उठता है कि ऐसा क्यों है और इसके पीछे क्या वजह है

अपडेटेड Dec 20, 2025 पर 2:03 PM
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Christmas 2025: दोनों धर्म इस बात पर सहमत हैं कि ईसा मसीह कयामत से पहले दोबारा दुनिया में लौटेंगे।

हर साल 25 दिसंबर आते ही दुनियाभर में क्रिसमस की रौनक दिखाई देने लगती है। चर्चों में प्रार्थनाएं होती हैं, घरों और बाजारों में सजावट नजर आती है और लोग इस दिन को यीशु मसीह के जन्म के रूप में मनाते हैं। इसी बीच अक्सर एक सवाल चर्चा में आ जाता है कि मुसलमान, जो ईसा मसीह का गहरा सम्मान करते हैं और उन्हें अल्लाह का पैगंबर मानते हैं, आखिर क्रिसमस क्यों नहीं मनाते। ये सवाल इसलिए भी दिलचस्प हो जाता है क्योंकि इस्लाम में ईसा मसीह का उल्लेख कुरान में कई बार मिलता है और उनकी मां मरियम को भी बेहद पवित्र माना गया है।

ऐसे में लोगों के मन में ये जिज्ञासा स्वाभाविक है कि जब दोनों धर्म ईसा को मानते हैं, तो त्योहारों को लेकर फर्क क्यों है। दरअसल इसके पीछे धार्मिक मान्यताएं, विश्वास और परंपराएं जुड़ी हुई हैं, जिन्हें समझना जरूरी है।

जीसस यानी हजरत ईसा (अलैहि सलाम)


इस्लाम में जीसस को हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) कहा जाता है और उन्हें अल्लाह का भेजा हुआ एक महान पैगंबर माना जाता है। कुरान में ईसा का ज़िक्र बहुत अहम शख्सियत के तौर पर किया गया है। दिलचस्प बात ये है कि कुरान में ईसा का नाम पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से भी ज्यादा बार आता है। उन्हें “ईसा” और “मसीहा” दोनों नामों से पुकारा गया है।

ईसाई और इस्लाम—ईसा को लेकर समानताएं

ईसाई और मुसलमान, दोनों ये मानते हैं कि ईसा का जन्म बिना पिता के मरियम (मरियम बिन्ते इमरान) से हुआ था और ये सब ईश्वर की इच्छा से हुआ। इस्लाम में इसे अल्लाह की कुदरत माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे आदम (अलैहि सलाम) का निर्माण बिना माता-पिता के हुआ था।

क्रूस और वापसी को लेकर अलग विश्वास

ईसाई मानते हैं कि जीसस को सूली पर चढ़ाया गया था, जबकि इस्लाम के अनुसार ऐसा नहीं हुआ। मुसलमानों का विश्वास है कि अल्लाह ने ईसा को बचा लिया और उन्हें आसमान में उठा लिया। हालांकि दोनों धर्म इस बात पर सहमत हैं कि ईसा मसीह कयामत से पहले दोबारा दुनिया में लौटेंगे।

मुसलमान क्रिसमस क्यों नहीं मनाते?

मुसलमान सभी पैगंबरों का सम्मान करते हैं, लेकिन क्रिसमस नहीं मनाते क्योंकि ये त्योहार ईसाई धर्म की कुछ मान्यताओं से जुड़ा है। इस्लाम एकेश्वरवाद यानी तौहीद में विश्वास करता है और ईसा को अल्लाह का बंदा और पैगंबर मानता है, ईश्वर नहीं। वहीं ईसाई धर्म में त्रिमूर्ति की अवधारणा है, जो इस्लामी शिक्षाओं से मेल नहीं खाती।

इस्लाम के अपने त्योहार और परंपराएं

इस्लाम में धार्मिक उत्सव कुरान और सुन्नत पर आधारित हैं, जैसे ईद-उल-फितर और ईद-उल-अजहा। मुसलमान ईसा और मरियम का सम्मान करते हैं, उनके नाम बच्चों को रखते हैं और उनकी शिक्षाओं से प्रेरणा लेते हैं, लेकिन जन्मदिन मनाने की परंपरा इस्लाम का हिस्सा नहीं है। इसी वजह से मुसलमान ईसा से प्रेम रखते हुए भी क्रिसमस नहीं मनाते।

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