होली का त्योहार पूरे देश में बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग आपसी मनमुटाव भूलकर एक-दूसरे को रंग और गुलाल लगाते हैं और खुशियों का इजहार करते हैं। इस दिन लोग जमकर रंगों से होली खेलते हैं। वहीं उत्तर प्रदेश के एक जिले में अनोखे तरह से होली मनाई जाती है। इस जिले में होली पर महिला सशक्तिकरण की खास मिसाल पेश की जाती है। यहां होली के अगले दिन गांवों में पूरी जिम्मेदारी महिलाओं के हाथ में होती है। ये अनोखी होली उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में मनाई जाती है।
लंभे समय से चली आ रही ये परंपरा
लोकल 18 से बातचीत में गीता देवी ने बताया कि, पीलीभीत के माधोटांडा क्षेत्र में ये परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। बताया जाता है कि इस इलाके को बसाने वाले राजस्थान से आए राजपूत समाज के लोगों ने महिलाओं को बराबरी का सम्मान देने के लिए इसकी शुरुआत की थी। इसी कारण होली के अगले दिन महिलाएं खुद होली खेलती हैं और सुबह होलिका दहन की रस्म भी निभाती हैं। ये परंपरा करीब एक सदी से अधिक समय से जारी है।
क्यों मनाई जाती है ये परंपरा
लोकल 18 से बातचीत में डॉ. अमिताभ अग्निहोत्री ने बताया कि, पीलीभीत के माधोटांडा क्षेत्र में होली के दिन पूरा माहौल महिलाओं के हाथ में रहता है। इस दौरान पुरुष आमतौर पर गांवों की गलियों से दूर रहते हैं या खुद को छिपाकर रखते हैं। महिलाएं समूह बनाकर हाथों में डंडे और कोड़े लेकर निकलती हैं और अगर रास्ते में कोई पुरुष मिल जाता है तो उसके साथ हंसी-मजाक करते हुए प्रतीकात्मक रूप से सजा भी देती हैं। ये परंपरा सिर्फ मस्ती या शोर-शराबे तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में महिलाओं के सम्मान और उनके महत्व को भी दिखाती है।
उनके मुताबिक, पुराने समय में इस परंपरा की शुरुआत इसलिए की गई थी ताकि साल में कम से कम एक दिन महिलाओं को घर और समाज की सीमाओं से पूरी तरह आजादी मिल सके। इस दिन महिलाएं खुलकर जश्न मनाती हैं और फाग जैसे लोकगीत गाकर अपनी भावनाएं व्यक्त करती हैं। यह परंपरा इस बात का संकेत देती है कि पीलीभीत की संस्कृति में नारी शक्ति को खास सम्मान दिया जाता है।
अबीर-गुलाल लगाकर देती है शुभकामना
इस उत्सव के समय गांवों में ढोलक और मंजीरों की आवाज गूंजती रहती है और महिलाएं समूह बनाकर फाग गाती हैं। वे एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं देती हैं। इस दौरान पुरुष खुद ही गलियों से दूर हो जाते हैं, ताकि महिलाएं बिना झिझक के जश्न मना सकें। यह परंपरा आपसी समझ और सम्मान की मिसाल मानी जाती है। पीलीभीत की यह खास होली आज भी अपनी पुरानी परंपरा के साथ मनाई जाती है।