उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की माधौगढ़ तहसील में इन दिनों किसानों के सामने एक हैरान करने वाली स्थिति खड़ी हो गई है। खेतों में मेहनत से उगाई गई गेहूं की फसल पूरी तरह तैयार है, लेकिन कागजों में हुई छोटी सी गलती उनकी सबसे बड़ी मुश्किल बन गई है। जहां एक तरफ किसान कटाई के बाद अच्छी कीमत की उम्मीद लगाए बैठे थे, वहीं दूसरी ओर सरकारी खरीद केंद्रों तक उनकी फसल पहुंच ही नहीं पा रही। वजह है रिकॉर्ड में गड़बड़ी, जिसने उनकी मेहनत और उम्मीदों के बीच दीवार खड़ी कर दी है।
इस समस्या ने न सिर्फ किसानों की आमदनी पर असर डाला है, बल्कि उन्हें मजबूरी में दूसरे विकल्प तलाशने पर भी मजबूर कर दिया है। अब ये स्थिति सवाल खड़ा कर रही है कि आखिर कागजी व्यवस्था की खामियों का बोझ कब तक किसानों को उठाना पड़ेगा।
खसरे की गलती बनी सबसे बड़ी बाधा
ग्राम अमखेड़ा के किसान नरसिंह ने करीब 35 बीघा में गेहूं उगाया, लेकिन जब बेचने पहुंचे तो पता चला कि खसरे में उनकी फसल ‘मूली’ दर्ज है। यही हाल कई अन्य किसानों का भी है, जिनके रिकॉर्ड में गेहूं की जगह चना, मटर या सब्जियां दर्ज हैं। असलियत और कागज के बीच यह फर्क किसानों के लिए मुसीबत बन गया है।
नई व्यवस्था में फंसे किसान
इस बार सरकार ने गेहूं खरीद प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए पंजीकरण को खसरा-खतौनी से जोड़ दिया है। अब वही किसान पंजीकरण करा पा रहे हैं, जिनके रिकॉर्ड में गेहूं दर्ज है। जिनके कागज गलत हैं, उनकी फसल खरीद केंद्रों तक पहुंच ही नहीं पा रही।
सर्वे में लापरवाही के आरोप
किसानों का कहना है कि क्रॉप सर्वे के दौरान कर्मचारियों ने सही तरीके से खेतों का निरीक्षण नहीं किया। बिना मौके पर गए ही फसल दर्ज कर दी गई, जिससे यह समस्या खड़ी हुई। कुछ किसानों ने आरोप लगाया कि लेखपालों ने लापरवाही के साथ-साथ पैसे लेकर भी गलत एंट्री की।
कहीं-कहीं किसान खुद भी इस परेशानी के जिम्मेदार हैं। किसान क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ाने के लिए उन्होंने पहले खसरे में नकदी फसलें दर्ज करवाई थीं, जिसका खामियाजा अब भुगतना पड़ रहा है।
औने-पौने दाम में बेचने की मजबूरी
सरकारी खरीद से वंचित किसान अब अपनी फसल व्यापारियों को कम कीमत पर बेचने को मजबूर हैं। इससे उन्हें आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है और उनकी आय पर सीधा असर पड़ रहा है।
समाधान की उम्मीद अभी बाकी
प्रशासन का कहना है कि जिन किसानों के रिकॉर्ड गलत हैं, वे तहसील जाकर संपर्क करें। खेतों का भौतिक सत्यापन होने के बाद खसरा ठीक किया जाएगा, ताकि किसान अपनी गेहूं की फसल सही दाम पर बेच सकें।