Video: कभी 50 रुपये रोज कमाकर चलाता था परिवार, आज Fortuner से ड्यूटी जाता है कर्नाटक का ये सफाईकर्मी

कर्नाटक के बंटवाल में एक सफाईकर्मी इन दिनों अपनी Fortuner को लेकर चर्चा में है। कभी महज 50 रुपये रोज कमाने वाला यह शख्स आज इसी गाड़ी से ड्यूटी पहुंचता है और वहां पहुंचकर हाथ में झाड़ू थाम लेता है। सोशल मीडिया पर वायरल इस नजारे ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है

अपडेटेड Sep 19, 2026 पर 2:08 PM
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आज भले ही उनकी फॉर्च्यूनर सुर्खियों में हो, लेकिन कार खरीदने का उनका शौक नया नहीं है।

कर्नाटक के बंटवाल के बीसी रोड पर सुबह का नजारा इन दिनों लोगों का ध्यान खींच रहा है। सड़क किनारे एक महंगी टोयोटा फॉर्च्यूनर आकर रुकती है। दरवाजा खुलता है और उससे एक सफाईकर्मी उतरता है। कुछ ही पलों में वह हाथ में झाड़ू लेकर अपनी रोज की ड्यूटी में जुट जाता है। सोशल मीडिया पर इस तस्वीर और इससे जुड़े वीडियो ने खूब चर्चा बटोरी। लेकिन इस कहानी का असली आकर्षण फॉर्च्यूनर नहीं, बल्कि उस शख्स का सफर है, जो कभी सिर्फ 50 रुपये रोज की मजदूरी पर परिवार चलाता था।

तीसरी कक्षा तक पढ़ाई और 50 रुपये की कमाई

नवूर निवासी सेसप्पन्ना ने 1996 में बंटवाल नगर निकाय में काम शुरू किया था। उस वक्त उन्होंने केवल तीसरी कक्षा तक पढ़ाई की थी और उन्हें रोजाना 50 रुपये मजदूरी मिलती थी। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि कई बार परिवार के लिए पर्याप्त खाना जुटाना भी मुश्किल हो जाता था। जिंदगी अभावों के बीच गुजर रही थी और आगे का रास्ता भी साफ नजर नहीं आता था।


2005 में आया जिंदगी बदलने वाला मोड़

सेसप्पन्ना की जिंदगी में साल 2005 एक अहम मोड़ लेकर आया। उस समय बंटवाल थाने में सब-इंस्पेक्टर रहे के. यू. बेलियप्पा ने उन्हें शराब छोड़ने और अपने काम व परिवार पर ध्यान देने की सलाह दी। सेसप्पन्ना ने इस सलाह को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया। उन्होंने शराब छोड़ दी और परिवार की जिम्मेदारियों के साथ अपने काम पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। यहीं से उनकी जिंदगी धीरे-धीरे बदलने लगी।

झाड़ू से लेकर कचरा वाहन चलाने तक

समय के साथ उनकी नगर निकाय की नौकरी स्थायी हो गई। काम भी केवल सड़कों की सफाई तक सीमित नहीं रहा। जरूरत पड़ने पर वह नगर निकाय का कचरा निपटाने वाला वाहन चलाते और दूसरी जिम्मेदारियां भी संभालते। आमतौर पर उनकी ड्यूटी सुबह करीब 5 बजे शुरू होती और दोपहर तक चलती। नगर निकाय की ड्यूटी खत्म होने के बाद भी उनका दिन खत्म नहीं होता था। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए वह अतिरिक्त काम और कमाई के दूसरे रास्ते तलाशते रहे।

मारुति 800 से शुरू हुआ कारों का सफर

आज भले ही उनकी फॉर्च्यूनर सुर्खियों में हो, लेकिन कार खरीदने का उनका शौक नया नहीं है। उन्होंने अलग-अलग समय पर मारुति 800, ओमनी, ऑल्टो, रिट्ज और स्कॉर्पियो जैसी गाड़ियां खरीदीं। पुरानी गाड़ी बेचकर और जरूरत पड़ने पर कर्ज लेकर वह धीरे-धीरे अगली गाड़ी तक पहुंचते गए। हाल में उन्होंने अपनी ऑल्टो और स्कॉर्पियो बेचकर तथा कुछ रकम उधार लेकर सेकेंड हैंड फॉर्च्यूनर खरीदी।

सबसे मुश्किल दिन: पिता के अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे

सेसप्पन्ना की जिंदगी में एक ऐसा दौर भी आया, जब उनके पास अपने पिता के अंतिम संस्कार तक के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे। हालात इतने कठिन थे कि उन्होंने अपने पिता का शव खुद उठाकर नेत्रावती नदी के किनारे पहुंचाया और अंतिम संस्कार किया। यह घटना उनकी जिंदगी की सबसे कड़वी यादों में से एक रही। शायद यही वजह है कि आज वह अपने परिवार के लिए आर्थिक सुरक्षा और बेहतर भविष्य बनाने को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं।

अब सपना है अपने परिवार के लिए नया घर

आज सेसप्पन्ना अपनी पत्नी, दो बेटियों और बेटे के साथ रहते हैं। फॉर्च्यूनर खरीदना उनके सफर का एक पड़ाव जरूर है, लेकिन उनकी नजर अब इससे आगे है। वह अपने परिवार के लिए नया घर बनाने की तैयारी में हैं एक ऐसा घर, जहां उनके बच्चों को उन आर्थिक परेशानियों का सामना न करना पड़े, जिनसे उन्होंने खुद जिंदगी भर संघर्ष किया।

फॉर्च्यूनर बदली, काम नहीं

सोशल मीडिया पर उनकी फॉर्च्यूनर चर्चा का विषय जरूर बन गई, लेकिन सेसप्पन्ना के लिए उनकी नौकरी आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वह महंगी गाड़ी से काम पर आएं या किसी साधारण वाहन से, ड्यूटी पर पहुंचने के बाद कहानी वही रहती है गाड़ी खड़ी होती है, हाथ में झाड़ू आती है और वह अपने काम में जुट जाते हैं।

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