ऊंट के आंसुओं की वैल्यू सुनकर उड़ जाएंगे होश, गांववालों की छप्परफाड़ कमाई!

World's most expensive tear: अब ऊंट सिर्फ रेगिस्तान के जहाज नहीं, बल्कि नई रिसर्च का अहम हिस्सा बन चुके हैं। वैज्ञानिक इनके आंसुओं से सांप के जहर को बेअसर करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। इस प्रयोग से ऊंट पालकों की किस्मत भी चमक रही है, क्योंकि उनके ऊंट अब आमदनी का नया जरिया बनते जा रहे हैं

अपडेटेड Jul 05, 2025 पर 12:43 PM
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World's most expensive tear: ऊंटों से बनी ये नई दवा ग्रामीण भारत के लिए संजीवनी बन सकती है

राजस्थान की तपती धूप और रेत में अब एक नई उम्मीद जन्म ले रही है। ऊंट, जिन्हें अब तक सिर्फ रेगिस्तान का जहाज कहा जाता था, अब जिंदगी बचाने वाले हीरो बनते जा रहे हैं। बीकानेर के नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन कैमेल (NRCC) के वैज्ञानिकों ने ऊंटों में छिपी एक अनोखी ताकत को पहचाना है, जो सांप के खतरनाक जहर से लड़ने में मदद कर सकती है। हर साल भारत में हजारों लोग सांप के काटने से जान गंवा देते हैं, खासकर ग्रामीण इलाकों में। ऐसे में ऊंट अब सिर्फ सफर का साथी नहीं, बल्कि एक जैविक योद्धा बन चुका है।

इस खोज से न सिर्फ स्वास्थ्य क्षेत्र को नई दिशा मिलेगी, बल्कि राजस्थान के ऊंट पालकों की जिंदगी भी बदल सकती है। ये कहानी विज्ञान, परंपरा और उम्मीद के अनोखे मेल की है, जो भारत के रेगिस्तान में चुपचाप आकार ले रही है।

ऊंटों के आंसुओं और खून में छिपा जहर का इलाज


NRCC के शोधकर्ताओं ने जहरीले सॉ-स्केल्ड वाइपर (Echis carinatus sochureki) के जहर से ऊंटों को सुरक्षित रूप से इम्यूनाइज किया। इसके बाद उनके आंसुओं और खून से निकाले गए एंटीबॉडीज ने ज़हर के असर जैसे कि खून बहना और थक्के न बनना (coagulopathy) — को प्रभावी ढंग से रोक दिया।

चौंकाने वाली बात ये रही कि ये ऊंट-उत्पन्न एंटीबॉडीज न केवल ज्यादा असरदार साबित हुईं, बल्कि पारंपरिक घोड़े से बनाए गए एंटीवेनम की तुलना में इनसे एलर्जी का खतरा भी बहुत कम था। इसके अलावा, ऊंटों से एंटीबॉडीज निकालना सस्ता और टिकाऊ तरीका भी है, जिससे बड़े पैमाने पर दवाइयों का निर्माण संभव हो सकेगा।

हर साल 58,000 मौतें...

भारत में हर साल लगभग 58,000 लोग सांप के काटने से दम तोड़ देते हैं और 1.4 लाख से ज्यादा लोग विकलांग हो जाते हैं। इन मामलों में से अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में होते हैं, जहां न तो समय पर इलाज मिल पाता है और न ही महंगी दवाइयों की पहुंच होती है।

ऐसे में ऊंटों से बनी ये नई दवा ग्रामीण भारत के लिए संजीवनी बन सकती है — सस्ती, असरदार और जल्दी उपलब्ध।

ऊंट पालकों की बदलती किस्मत

ये खोज न केवल स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्रांति ला रही है, बल्कि ऊंट पालने वाले किसानों के जीवन में भी नई रोशनी लेकर आई है। बीकानेर, जैसलमेर और जोधपुर जैसे क्षेत्रों में ऊंट पालकों को NRCC की ओर से अपने ऊंटों के आंसू और खून के नमूने देने के लिए आमंत्रित किया गया है पूरी तरह से सुरक्षित और वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत।

इसके बदले इन किसानों को प्रति ऊंट ₹5,000 से ₹10,000 तक की अतिरिक्त मासिक आमदनी मिल रही है। यानी एक नई आय का स्रोत, वो भी बिना ऊंट को कोई नुकसान पहुंचाए।

जब ऊंट बने रेगिस्तान के 'बायो-मिरेकल'

ऊंट, जो सदियों से थकाऊ सफर और बोझ ढोने में इस्तेमाल होते रहे हैं, अब बायो-मिरेकल्स यानी जैविक चमत्कार बनकर उभरे हैं। उनकी प्रतिरोधक क्षमता और कठोर जलवायु में जीने की ताकत ने उन्हें सांप के जहर से लड़ने के लिए आदर्श बना दिया है। NRCC की ये पहल न केवल वैज्ञानिक उपलब्धि है, बल्कि स्थानीय आजीविका, स्वदेशी ज्ञान और ग्रामीण नवाचार का बेहतरीन उदाहरण भी है।

भारत की मिट्टी से निकली इलाज की राह

जहां एक ओर दुनिया महंगी बायोटेक्नोलॉजी की तरफ भाग रही है, वहीं भारत की धूल भरी मिट्टी में ऊंट जैसे देसी जानवरों के ज़रिये चिकित्सा में क्रांति हो रही है। इस रिसर्च से एक बात साफ हो गई है समाधान हमेशा हाई-टेक लैब्स से नहीं, बल्कि हमारे आस-पास की जमीन से भी निकल सकते हैं।

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