6 साल की लड़ाई के बाद सास-ससुर ने जीता केस, बहू घरेलू हिंसा के नाम पर हड़पना चाहती थी बंगला, अब घर खाली करने के साथ देगी 7 साल का किराया

बहू, सास-ससुर पर घरेलू हिंसा का आरोप में फंसाकर बंगला हड़पना चाहती थी। वह घर जो सास-ससुर ने अपनी मेहनत की कमाई से बनाया। उन्हें ही उन्हीं के घर से निकालना चाहती थी। इस मामले में अदालत ने अहम फैसला सुनाया..

अपडेटेड Jul 11, 2025 पर 3:40 PM
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बहू सास-ससुर पर घरेलू हिंसा का आरोप में फंसाकर बंगला हड़पना चाहती थी।

बहू सास-ससुर पर घरेलू हिंसा का आरोप में फंसाकर बंगला हड़पना चाहती थी। वह घर जो सास-ससुर ने अपनी मेहनत की कमाई से बनाया। उन्हें ही उन्हीं के घर से निकालना चाहती थी। इस मामले में अदालत ने अहम फैसला सुनया। अब बहू को घर खाली करने के साथ 7 साल का किराया सास-ससुर को चुकाना होगा। महाराष्ट्र में एक बेहद अहम केस में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक बुजुर्ग दंपत्ति को अपनी खुद की संपत्ति से बेटे और बहू को बेदखल करने की इजाजत दी है।

क्या है पूरा मामला

केस की शुरुआत साल 2016 में हुई जब एक महिला ने अपने पति और ससुराल वालों पर 498A यानी दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और वैवाहिक विवादों से जुड़े कई मुकदमे दर्ज किए। महिला का दावा था कि उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। वहीं दूसरी ओर उसके सास-ससुर ने यह कहते हुए सीनियर सिटिज़न ट्राइब्यूनल में याचिका दायर की कि अब वह अपने ही घर में मानसिक तनाव और उत्पीड़न झेल रहे हैं और अपने बेटे-बहू को घर से निकालना चाहते हैं।


कैसे शुरू हुई कानूनी लड़ाई?

2008 में पति के माता-पिता ने अपनी मेहनत की कमाई से एक बंगला खरीदा। 2016 में बेटे और बहू को घर में रहने की अनुमति दी क्योंकि उनकी शादी हाल ही में हुई थी और उनके पास रहने का कोई दूसरी जगह नहीं थी। लेकिन कुछ ही समय बाद बहू ने उनके खिलाफ आपराधिक और वैवाहिक मुकदमे दायर कर दिए। इसके बाद 2019 में सास-ससुर ने सीनियर सिटिजन एक्ट 2007 के तहत ट्राइब्यूनल में याचिका दायर की और ट्राइब्यूनल ने बेटे और बहू को 30 दिनों में घर खाली करने का आदेश दिया।

लेकिन 2020 में बहू ने इस आदेश को चुनौती दी और एपलेट ट्राइब्यूनल ने ट्राइब्यूनल के ऑर्डर को कैंसिल कर दिया। इस पर बुजुर्ग दंपत्ति ने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा?

18 जून 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि बेटे और बहू को माता-पिता ने रहने की अनुमति दी थी, इसका मतलब यह नहीं कि बहू को इस संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार मिल गया। न्यायालय ने कहा कि जब संबंध टूट चुके हों और बहू स्वयं अपने ससुरालवालों पर आपराधिक मुकदमे कर चुकी हो, तब उसे सास-ससुर के घर में जबरन रहने का कोई अधिकार नहीं है।

बहू के तर्क हुए खारिज

बहू के वकीलों ने कहा कि चूंकि घरेलू हिंसा और वैवाहिक मुकदमे अभी पेंडिंग हैं, इसलिए बहू को ससुराल के घर में रहने का अधिकार है। लेकिन कोर्ट ने पूछा कि जब बहू के नाम पर पहले से ही तीन कमरों का एक घर है, तो वह क्यों अपने ससुराल वालों के घर में रहना चाहती है? इसके जवाब में बहू ने कोई ठोस डॉक्यूमेंट या कानूनी आदेश नहीं दे पाई, जिससे यह साबित हो कि उसे ससुराल के घर में रहने का कोई वैलिड अधिकार है।

पति को भी किया गया बेदखल

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि बेटा और बहू दोनों ही घर से बाहर निकलें, क्योंकि यह संपत्ति उनके माता-पिता की है और उन्होंने ही इसको खरीदा था। अदालत ने दोनों को 30 दिन के अंदर घर खाली करने और बकाया किराया 20,000 रुपये मंथली के हिसाब से फरवरी 2019 से अब तक चुकाने का आदेश दिया है।

कोर्ट का सख्त रुख

अदालत ने यह भी कहा कि बहू ने अदालत के पहले आदेश की अवहेलना की और अब तक अनावश्यक रूप से संपत्ति पर कब्जा बनाए रखा, जिससे बुजुर्ग दंपत्ति को कोर्ट की दौड़ लगानी पड़ी। यह केस सिर्फ एक परिवार की लड़ाई नहीं थी, बल्कि उन लाखों सीनियर सिटिजन की आवाज जो बच्चों या उनके जीवनसाथियों से उत्पीड़न का शिकार होते हैं।

पेरेंट्स अपने दम पर जो प्रॉपर्टी खरीदते हैं, तो कोई भी, चाहे वह उनका बेटा और बहू उनकी मर्जी के बिना उसमें रह भी नहीं सकते। ऐसे मामलों में बहू घरेलू हिंसा कानून का गलत इस्तेमाल नहीं कर सकती।

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