प्लास्टिक की बोतलें, कैन और स्क्रैप हमारे लिए अक्सर बेकार कचरा होते हैं, लेकिन एक कारोबारी के लिए यही चीजें कमाई का बड़ा जरिया बन गईं। उसकी कहानी सोशल मीडिया पर तब सामने आई, जब एक रिश्तेदार ने शादी के दौरान उसकी महंगी लिमिटेड-एडिशन Rolex घड़ी देखी और उत्सुकता में उसके काम के बारे में पूछ लिया। जवाब मिला, “प्लास्टिक का बिजनेस।” यह सुनकर उसे लगा कि शायद सामान्य प्लास्टिक की खरीद-बिक्री का कारोबार होगा। लेकिन जब उसने पूछा कि इस काम से इतनी अच्छी कमाई कैसे हो रही है, तो सामने आई पूरी बिजनेस स्ट्रैटेजी ने उसे हैरान कर दिया।
कारोबारी का मॉडल नया प्लास्टिक बनाने के बजाय फेंके गए प्लास्टिक को इकट्ठा करना, उसे छांटना, साफ करना और रीसायकल करके दोबारा इस्तेमाल लायक कच्चे माल में बदलना था। खास बात यह है कि इस मॉडल में कचरे की कीमत बढ़ाकर उसे दूसरी इंडस्ट्री के लिए उपयोगी बनाया जाता है।
‘प्लास्टिक का काम लेकिन कहानी कुछ और थी
X यूजर प्रथम ने बताया कि शादी में उसकी मुलाकात अपने कजिन से हुई। बातचीत के दौरान उसकी नजर कजिन की लिमिटेड-एडिशन Rolex पर पड़ी। उत्सुकता में उसने पूछा कि वह करता क्या है। जवाब मिला “प्लास्टिक का बिजनेस।” पहले प्रथम को लगा कि यह सामान्य प्लास्टिक खरीदने-बेचने का कारोबार होगा। लेकिन जब उसने पूछा कि इससे इतनी कमाई कैसे हो रही है, तो सामने आई बिजनेस की असली तस्वीर।
कचरा खरीदो, कच्चा माल तैयार करो
बताया गया कि फैक्ट्री करीब ₹13 प्रति किलो के हिसाब से इस्तेमाल की हुई प्लास्टिक बोतलें, कैन और अन्य प्लास्टिक स्क्रैप खरीदती है। इसके बाद प्लास्टिक को अलग-अलग किया जाता है, साफ किया जाता है और प्रोसेस करके रीसाइकल्ड प्लास्टिक ग्रैन्यूल्स में बदला जाता है। यही ग्रैन्यूल्स आगे दूसरी इंडस्ट्री के लिए उपयोगी कच्चा माल बन जाते हैं।
₹13 का प्लास्टिक, ₹80-90 किलो तक बिक्री
पोस्ट के मुताबिक, तैयार रीसाइकल्ड ग्रैन्यूल्स करीब ₹80-90 प्रति किलो में बिक सकते हैं। इनका इस्तेमाल कार और ऑटो पार्ट्स, पैकेजिंग, पाइप, कपड़ों के फाइबर, घरेलू सामान और कई औद्योगिक उत्पाद बनाने में किया जाता है। यानी असली कमाई सिर्फ प्लास्टिक बेचने में नहीं, बल्कि कचरे को दोबारा इस्तेमाल लायक कच्चे माल में बदलने में है।
50 टन महीने का हिसाब सुनकर चौंक गया शख्स
प्रथम ने बताया कि अगर फैक्ट्री हर महीने करीब 50 टन प्लास्टिक प्रोसेस करे और औसतन ₹80 प्रति किलो की दर से बिक्री हो, तो लगभग ₹40 लाख की मासिक बिक्री बन सकती है। हालांकि, यह आंकड़ा रेवेन्यू है, मुनाफा नहीं। इसमें कच्चे माल की खरीद, मशीनरी, बिजली, मजदूरी, परिवहन और दूसरे खर्च शामिल नहीं किए गए हैं।
असली खेल ‘Waste-to-Wealth’ का
इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि कारोबारी ने कोई चमकदार नया प्रोडक्ट बेचकर शुरुआत नहीं की। उसने ऐसी चीज को कारोबार में बदला, जिसे ज्यादातर लोग बेकार समझकर फेंक देते हैं। यही वजह है कि प्रथम ने इसे सिर्फ ‘प्लास्टिक बिजनेस’ नहीं, बल्कि ‘Waste-to-Wealth’ बिजनेस बताया।