ईसाई धर्म में क्रिसमस का त्योहार बेहद खास माना जाता है और ये दुनिया भर में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। पूरे साल लोग इस दिन का इंतजार करते हैं, खासकर बच्चे। क्रिसमस पर सांता क्लॉज की बात बच्चों के लिए सबसे आकर्षक होती है, जो उन्हें उपहार देता है और बच्चों की खुशी इस दिन का अहम हिस्सा बनाती है। घरों और चर्चों को रंग-बिरंगी रोशनी, क्रिसमस ट्री और सजावट से सजाया जाता है, जिससे ये त्योहार और भी रोमांचक और जादुई लगने लगता है। सिर्फ बच्चों ही नहीं, बड़े भी इस दिन को उत्साह और प्रेम के साथ मनाते हैं।
इस दिन परिवार और मित्र मिलकर खुशियां बांटते हैं, मिठाईयां खाते हैं और गीत-संगीत का आनंद लेते हैं। यही कारण है कि क्रिसमस हर किसी के लिए प्रेम, सौहार्द और खुशियों का प्रतीक बन गया है।
25 दिसंबर की असली तारीख
असल में, ये तय नहीं कि जीसस क्राइस्ट का जन्म सच में 25 दिसंबर को हुआ था। कई शताब्दियों तक ईसाई समुदाय ने जन्मदिन के लिए कोई निश्चित तारीख नहीं रखी थी। लेकिन 350 ईस्वी में पोप जूलियस प्रथम ने पहली बार 25 दिसंबर को ईश्वर का जन्मदिन मानकर मनाने की तारीख चुनी। बाद में 529 ईस्वी में रोमन सम्राट जस्टिनियन ने इसे सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया।
क्रिसमस का इतिहास
सबसे पहले 336 ईस्वी में रोम में पहले ईसाई सम्राट के शासनकाल में 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाने की शुरुआत हुई। कुछ साल बाद पोप जूलियस ने इसे आधिकारिक रूप दे दिया।
क्यों कहा जाता है 'X-MAS'?
क्रिसमस को “एक्स मास” भी कहा जाता है। इसका रोचक कारण है। 1752 में इंग्लैंड में मार्च को साल का पहला महीना माना जाता था, इसलिए दिसंबर दसवां महीना बन गया। रोमन लिपि में “X” दस का प्रतीक है और “मास” का मतलब महीना। इसलिए दसवें महीने में मनाए जाने के कारण इसे एक्स मास कहा गया।
प्रेम और खुशियों का त्योहार
क्रिसमस केवल ईसाईयों का त्योहार नहीं है। अब सभी धर्म और समुदाय इसे मिलकर मनाते हैं। यह त्योहार लगभग एक हफ्ते तक चलता है और प्रेम, खुशियों और सौहार्द का संदेश लेकर आता है।
