सफेद बाल दिखते ही ज्यादातर लोग इसे बढ़ती उम्र या तनाव से जोड़ देते हैं। कई लोग इन्हें छिपाने के लिए हेयर डाई का सहारा भी लेते हैं। लेकिन अब वैज्ञानिकों की एक नई रिसर्च ने इस सोच को नया नजरिया दिया है। शोध के अनुसार, बालों का सफेद होना हमेशा सिर्फ उम्र बढ़ने का संकेत नहीं होता, बल्कि यह शरीर के अंदर चल रही एक महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रिया का हिस्सा भी हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि शरीर कई बार क्षतिग्रस्त कोशिकाओं से खुद को सुरक्षित रखने के लिए ऐसे बदलाव करता है, जिनका असर हमारे बालों पर भी दिखाई देता है। यह खोज उम्र बढ़ने और शरीर की सुरक्षा प्रणाली को समझने में नई संभावनाएं खोल सकती है।
बालों का रंग कैसे तय होता है?
हर बाल की जड़ यानी हेयर फॉलिकल में मेलानोसाइट स्टेम सेल्स मौजूद होते हैं। यही कोशिकाएं मेलेनिन बनाती हैं, जिससे बालों को प्राकृतिक रंग मिलता है। समय के साथ धूप, उम्र और अन्य कारणों से इन कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचता रहता है। जब यह नुकसान एक तय सीमा से ज्यादा हो जाता है, तब ये कोशिकाएं आगे बढ़ने या खुद को रोक देने के बीच फैसला करती हैं।
सफेद बाल बन सकते हैं शरीर का 'सेफ्टी मोड'
जापान के वैज्ञानिकों ने पाया कि जब कोशिकाओं के डीएनए को गंभीर नुकसान पहुंचता है, तो कई स्टेम सेल्स खुद को बढ़ने से रोक देती हैं। वे समय से पहले निष्क्रिय हो जाती हैं और धीरे-धीरे खत्म हो जाती हैं। इसका असर यह होता है कि बालों में रंग बनने की प्रक्रिया रुक जाती है और बाल सफेद दिखाई देने लगते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह शरीर का एक सुरक्षा तंत्र हो सकता है, जिससे क्षतिग्रस्त कोशिकाएं आगे नुकसान न पहुंचा सकें।
हर नुकसान का नतीजा सफेद बाल नहीं होता
रिसर्च में यह भी सामने आया कि कुछ तरह के हानिकारक तत्वों, जैसे तेज UV-B किरणों और कुछ कैंसर पैदा करने वाले रसायनों के संपर्क में आने पर यही कोशिकाएं रुकने के बजाय तेजी से बढ़ने लगती हैं। ऐसी अनियंत्रित वृद्धि आगे चलकर मेलानोमा जैसे खतरनाक त्वचा कैंसर का कारण बन सकती है।
क्या सफेद बाल मतलब कैंसर का खतरा नहीं?
वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि इस रिसर्च का मतलब यह नहीं है कि जिन लोगों के बाल सफेद हो रहे हैं, उन्हें कैंसर नहीं होगा। उनका कहना है कि सफेद बाल सिर्फ यह दिखाते हैं कि शरीर ने क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को हटाने का रास्ता चुना। अगर यह प्रक्रिया काम न करे, तो वही कोशिकाएं लंबे समय तक बनी रह सकती हैं और कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
अभी इंसानों पर नहीं हुई पुष्टि
यह अध्ययन चूहों पर किया गया था। इसलिए इसके नतीजों को सीधे इंसानों पर लागू नहीं किया जा सकता। हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि यह रिसर्च उम्र बढ़ने और कैंसर के बीच मौजूद जैविक संबंधों को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकती है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अब वे यह जानने की कोशिश करेंगे कि क्या इस खोज के आधार पर भविष्य में त्वचा कैंसर की रोकथाम, नई दवाओं या जांच के बेहतर तरीकों का विकास किया जा सकता है। फिलहाल, अगर आपके बाल सफेद हो रहे हैं तो इसे सिर्फ बढ़ती उम्र का संकेत मानने के बजाय शरीर की एक जटिल जैविक प्रक्रिया का हिस्सा भी माना जा सकता है।