Ravi Varma: मुंबई ऑक्शन में ₹167 करोड़ में बिकी रवि वर्मा की पेंटिंग में आखिर क्या है खास? जानिए

Yashoda-Krishna Painting: राजा रवि वर्मा पहले भारतीय कलाकार थे जिन्होंने लिथोग्राफ के जरिए अपनी कलाकृतियों का बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन किया। इसी वजह से 'यशोदा और कृष्ण' की छवि कैलेंडरों, मंदिरों और आम घरों की दीवारों तक पहुंची। यह पेंटिंग केवल एक आर्ट गैलरी का हिस्सा नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की स्मृतियों और श्रद्धा का हिस्सा है

अपडेटेड Apr 05, 2026 पर 3:22 PM
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इस मास्टरपीस को सीरम इंस्टीट्यूट के प्रमुख साइरस पूनावाला ने खरीदा

Ravi Varma Painting: भारतीय कला जगत के लिए बीतें दिन एक ऐतिहासिक कीर्तिमान दर्ज हुआ। राजा रवि वर्मा की  'यशोदा और कृष्ण' की कालजयी पेंटिंग ने नीलामी के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। मुंबई में 'सैफ्रनआर्ट' की स्प्रिंग लाइव ऑक्शन में यह पेंटिंग ₹167.20 करोड़ की भारी-भरकम कीमत पर बिकी। इस मास्टरपीस को सीरम इंस्टीट्यूट के प्रमुख साइरस पूनावाला ने खरीदा, जिसके साथ ही यह अब तक की सबसे महंगी आधुनिक भारतीय कलाकृति बन गई है। आइए आपको बताते हैं इस खास पेंटिंग के बारे में।

क्यों खास है राजा रवि वर्मा की यह पेंटिंग?

19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत के बीच बनाई गई यह पेंटिंग मां यशोदा और बाल कृष्ण के बीच के एक बेहद आत्मीय पल को दर्शाती है। इसकी कुछ खूबियां इसे दुनिया से अलग बनाती हैं:


देवत्व नहीं, वात्सल्य पर जोर: पारंपरिक चित्रों में अक्सर भगवान को बहुत दूर या दिव्य दिखाया जाता है, लेकिन रवि वर्मा ने कृष्ण को एक मां की गोद में खेल रहे एक सामान्य बच्चे के रूप में चित्रित किया है।

मानवीय भावनाएं: पेंटिंग में मां-बेटे की आंखों की चमक और उनके चेहरों की कोमलता इसे मातृत्व का एक वैश्विक प्रतीक बनाती है, जिससे हर कोई जुड़ाव महसूस करता है।

यूरोपीय तकनीक का जादू: रवि वर्मा ने भारतीय पौराणिक विषयों को यूरोपीय ऑयल पेंटिंग तकनीक के साथ जोड़ा। इसमें कपड़ों की बनावट, गहनों की बारीकी और त्वचा की रंगत इतनी असली लगती है कि मानों पात्र जीवित हो उठें।

कैलेंडर से लेकर मंदिरों तक: सांस्कृतिक पहचान

इस पेंटिंग की कीमत बढ़ने के पीछे इसका सांस्कृतिक महत्व भी एक बड़ी वजह है। राजा रवि वर्मा पहले भारतीय कलाकार थे जिन्होंने लिथोग्राफ के जरिए अपनी कलाकृतियों का बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन किया। इसी वजह से 'यशोदा और कृष्ण' की छवि कैलेंडरों, मंदिरों और आम घरों की दीवारों तक पहुंची। यह पेंटिंग केवल एक आर्ट गैलरी का हिस्सा नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की स्मृतियों और श्रद्धा का हिस्सा है। यही कारण है कि कलेक्टर इसे पाने के लिए करोड़ों खर्च करने को तैयार रहते हैं।

नीलामी में अरबपतियों के बीच मची होड़

इस पेंटिंग की शुरुआती अनुमानित कीमत ₹80 से ₹120 करोड़ के बीच लगाई गई थी, लेकिन बोली इतनी दिलचस्प रही कि यह ₹167 करोड़ के पार पहुंच गई। राजा रवि वर्मा की मूल पेंटिंग्स बहुत कम उपलब्ध है। जब भी ऐसी कोई बड़ी कलाकृति बाजार में आती है, तो उसकी मांग आसमान छूने लगती है। एस. एच. रज़ा और तैयब मेहता जैसे दिग्गजों की पेंटिंग्स भी करोड़ों में बिकती रही हैं, लेकिन 'यशोदा और कृष्ण' की इस बिक्री ने साबित कर दिया है कि अब खरीदार उन कलाकृतियों पर प्रीमियम देने को तैयार हैं जिनका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वजन बहुत ज्यादा है।

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